003 Natural Beauty Tips स्वदेशी चिकित्सा - सौन्दर्य-निखार आमुख
Natural Beauty Tips
स्वदेशी चिकित्सा - सौन्दर्य-निखार
आमुख
इस दौर में जबकि कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों का बाज़ारों में अंबार लगा हुआ हो और लोग विज्ञापनी मायाजाल के वशीभूत इनके पीछे पागल हुए जा रहे हों, तो लेखक ने इस पुस्तक के जरिए भारतीय संस्कृति और परम्परा के अनुकूल एकदम निरापद स्वदेशी सौन्दर्य-रक्षक उपायों को अपनाने की प्रेरणा जगाने का एक सद्प्रयास किया है। यह पुस्तक अपनी इस स्थापना में काफ़ी हद तक सफल है कि सौन्दर्य निखारने के कृत्रिम पश्चिमी तौर-तरीक़े भारतीय परम्परा और विरासत के पासंग भी नहीं ठहरते। इतना ही नहीं, यह पुस्तक अपने छोटे कलेवर के बावजूद कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों व कुछ अन्य कृत्रिम उत्पादों के हानिकारक पहलुओं पर भी सिलसिलेवार ढंग से तर्कपूर्ण और तथ्यात्मक विवेचन प्रस्तुत करती है।
वैसे तो सुन्दरता बढा़ने के गुर बताने वाली ढेरों पुस्तकें बाज़ार में उपलब्ध हैं, पर इस पुस्तक की विशेषता यह है कि यह लोगों के सौन्दर्यबोध में ही सार्थक बदलाव लाने की कोशिश करती है। जहाँ इस विषय की अन्य अधिकांश पुस्तकें लोगों को तड़क-भड़क वाली उपभोक्तावादी बनावटी ज़िन्दगी जीने की तरफ़ ही घसीटने की कोशिश करती दिखाई देती हैं, वहाँ इस पुस्तक में देश की जनता को संयम व सादगीपूर्ण जीवन की ओर मोड़ने का प्रयत्न किया गया है। यही वास्तव में आजा़दी बचाओ आन्दोलन का मिशन भी है।
लेखक सन्त समीर जी ने बाह्य शारीरिक सौन्दर्य के साथ-साथ मानसिक और चारित्रिक सौन्दर्य विषयक चर्चा करके इस लघुकाय पुस्तक को कई अर्थों में सर्वांगपूर्ण बना दिया है। अच्छी बात यह भी है कि स्त्री-पुरुष दोनों ही वर्गों के लिए इस पुस्तक की समान उपयोगिता है। अन्त में, मेरी कामना यही है कि अपने सौन्दर्य के प्रति सचेत देश के स्त्री-पुरुष कृत्रिम प्रसाधनों के मोहजाल से छूटकर इसमें सुझाए गए अकृत्रिम और निरापद उपायों को आज़माएं तथा कृत्रिम प्रसाधनों के जरिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा की जा रही करोड़ों-अरबों रुपयों के अकूत धन की लूट से इस देश को बचाने की मुहिम में भागीदार बनें।
राजीव दीक्षित
राष्ट्रीय प्रवक्ता, आज़ादी बचाओ आन्दोलन
Table of Contents (विषय सूची)
2. बढ़ सकता हैं मुखड़े का आकर्षण
3. सुन्दरता के प्रतीक काले-घने-घुँघराले बाल
4. शरीर और साँसों की बदबू भगाइए
5. स्त्रियों की समस्या अविकसित, बेडौल वक्ष
6. कुछ नुस्खे़ हाथ-पैरों की देखभाल के लिए
7. सौन्दर्य में निखार लाए मालिश
8. सौन्दर्यरक्षक आभ्यंतर प्रयोग
9. स्वास्थ्य और सौन्दर्य का शत्रु मोटापा
10. दुबलापन भगाइए सौन्दर्य बचाइए
11. कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों से सावधान !
12. सुन्दरता का शत्रु है साबुन
13. टूथब्रश़: स्वास्थ्य का साधन या रोगाणुओं की सराय
14. शीतल पेय भी हैं सौन्दर्य के शत्रु
15. सौन्दर्य का नाश करता है नशा
सौन्दर्य चाहिए तो स्वास्थ्य बचाइए
सौन्दर्य प्रसाधनों के दिन-दूने रात-चौगुने बढ़ते बाज़ार को देखकर यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि लोग सुन्दरता के लिए कितने परेशान हैं। स्त्री-पुरुष यहाँ तक कि नई पीढ़ी के बच्चे तक सुन्दर दिखने के लिए मेकअप के नए-नए तरीक़े आज़माने में लगे हैं। सुन्दरता के प्रति इतनी जागरूकता शायद पहले कभी नहीं रही। यदि इतनी ही जागरूकता समूचे स्वास्थ्य को लेकर लोगों में होती तो चिन्ता की विशेष बात नहीं थी। लेकिन दुर्भाग्य से लोग स्वास्थ्य के प्रति पूरी मनमानी करते हुए भी कृत्रिम प्रसाधनों के सहारे अपना सौन्दर्य निखारना चाहते हैं। अब कौन समझाए कि हँसना और गाल फुलाना, दोनों एक साथ नहीं हो सकते। अगर कुछ लोग यह सोचते हों कि वे स्वास्थ्य के प्रति पूरे लापरवाह रहकर भी अपने सौन्दर्य की हिफ़ाज़त कर लेंगे तो वे निरा भ्रम के ही शिकार हैं। बाज़ारू सौन्दर्य प्रसाधनों का नकली आवरण असलियत को कितनी देर छुपाएगा? वास्तव में सच्चे सौन्दर्य का रहस्य तो अच्छे स्वास्थ्य में ही छुपा है। स्वास्थ्य निखरेगा तो सौन्दर्य में अपने आप निखार आ जाएगा, यह तय है।
कहने का सीधा सा अर्थ यह है कि अगर सौन्दर्य चाहिए तो स्वास्थ्य को सही-सलामत रखने का इन्तज़ाम भी अनिवार्यत: करना ही पड़ेगा। अब सवाल यह हो सकता है कि स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए किया क्या जाए? तो इसका सीधा सा उत्तर है कि दिनचर्या सुधार ली जाए, तो बहुत कुछ ठीक हो जाएगा। दिनचर्या में आहार, निद्रा और व्यायाम पर ध्यान देना सबसे महत्त्वपूर्ण बातें हैं। आहार के विषय में आयुर्वेद का प्राचीन आदर्श है-हितभुक् मितभुक् ऋतभुक्। भाव यह है कि भोजन शरीर की अवस्था के अनुकूल हितकारी, उचित मात्रा में और प्रकृति सम्मत होना चाहिए। जिन्हें अपने सौन्दर्य-रक्षा की चिन्ता है उन्हें शुद्ध सात्विक शाकाहार अपनाना चाहिए। दाल, चावल, गेहूँ, जौ, बाजरा आदि विविध अन्नों के साथ हरी साग-सब्ज़ी, फल व सलाद की समुचित मात्रा अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। यह ज़रूरी नहीं है कि स्वास्थ्य सुधारने के लिए आप महँगे फल-मेवे की तरफ़ ही भागें। मौसम के अनुसार मिलने वाले ढेरों सस्ते फल, सब्जियां आदि हैं जिनका उपयोग अपनी शारीरिक प्रकृति को देखते हुए किया जाय तो स्वास्थ-रक्षा का काम बखूबी हो सकता है।
आहार के विषय में यह ध्यान देने वाली बात है कि वर्तमान में जो लोगों की दिन भर कुछ न कुछ खाते रहने की आदत बढ़ रही है, यह ग़लत है। इसके अलावा ‘फास्ट फूड’ संस्कृति ने आहार के मामले में और भी ज़्यादा भ्रष्टाचार फैला दिया है। अगर अपने स्वास्थ्य व सौन्दर्य की हिफ़ाज़त करनी है तो इन आदतों को भी सुधारना ही पड़ेगा। दिन भर में मुख्य भोजन सिर्फ दो बार करना ही सेहत की दृष्टि से उचित है। यदि दोपहर 12 बजे तथा शाम 8 बजे के आस-पास भोजन करने की आदत हो तो सबेरे 8 बजे और तीसरे पहर 4 बजे के आस- पास हल्का सुपाच्य नाश्ता लिया जा सकता है। वैसे शाम का भोजन सूर्यास्त तक कर लेना श्रेयस्कर है। जो लोग दोपहर का भोजन जल्दी करते हैं, वे सबेरे नाश्ते की आदत न बनायें तो अच्छा है। भोजन के साथ ढेर सारा पानी पीने की भी लोगों की अक्सर ग़लत आदत देखने को मिलती है। यह आदत एक न एक दिन पाचन संबंधी विकारों का कारण अवश्य बनती है। भोजन में यदि रोटी आदि सूखी चीजे़ें ज़्यादा मात्रा में हों, तो ही बीच-बीच में यदा-कदा एकाध घूँट पानी लिया जा सकता है, अन्यथा भोजन के कम से कम डेढ़ दो घंटे बाद ही पर्याप्त मात्रा में पानी पीना उचित है। स्वास्थ्य की दृष्टि से दिन भर में कम से कम 7-8 गिलास पानी अवश्य पीना चाहिए। दोपहर के भोजन के बाद आधा घंटा विश्राम तथा रात के भोजन के बाद लगभग आधा घंटा टहलने की आदत स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है। आहार के बाद निद्रा पर भी विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है। रात देर तक जगने तथा सबेरे देर तक सोने की आदत आजकल आम बात हो गई है। यदि कोई विशेष विवशता न हो तो रात 10 बजे तक सो जाना तथा सबेरे 4-5 बजे तक जग जाना आदर्श स्थिति है। अलबत्ता, कुछ लोगों की शारीरिक प्रकृति ऐसी भी हो सकती है, जिन्हें नींद का समय कुछ कम या ज़्यादा भी करना पड़ सकता है। सामान्य नियम यह है कि जितनी नींद से मन और शरीर में प्रफुल्लता और ताज़गी बनी रहे, उतनी नींद पर्याप्त है।
आहार और निद्रा के बाद व्यायाम अथवा शारीरिक श्रम सबसे ज़रूरी चीज़ है। शरीर को सुडौल तथा कार्यक्षम बनाए रखने के लिए व्यायाम वास्तव में अनिवार्य है। जो लोग व्यायाम या शरीर श्रम पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते वे पौष्टिक आहार का भी उचित लाभ नहीं ले सकते। खाया पिया शरीर में अच्छी तरह जज़्ब हो, इसके लिए व्यायाम या श्रम ज़रूरी है। स्वास्थ्य और सौन्दर्य रक्षा के लिए प्रतिदिन एकाध घंटे का समय व्यायाम के लिए अवश्य दिया जाना चाहिए। योगासन-व्यायाम की किसी अच्छी पुस्तक से इस विषय में जानकारी ली जा सकती है। बेहतर है कि किसी योगासन-व्यायाम केन्द्र या विशेषज्ञ व्यक्ति से उचित विधि से प्रशिक्षण लेने के बाद ही इसे दिनचर्या में शामिल किया जाय।
अन्त में, स्वास्थ्य और सौन्दर्य की दृष्टि से ब्रह्मचर्य पालन पर भी किंचित संकेत कर देना आवश्यक है। वैसे बह्मचर्य के व्यापक अर्थों में आहार, निद्रा, व्यायाम जैसी चीज़ें भी शामिल हैं; परन्तु यहाँ ब्रह्मचर्य का उल्लेख वीर्य-रक्षा के विशेष अर्थ में किया जा रहा है। विवाहित लोगों के लिए सिर्फ इतना संकेत पर्याप्त है कि अगर उन्हें स्वास्थ्य और सौन्दर्य को बरक़रार रखना है तो वे स्त्री-संसर्ग के मामले में ऋतुगामी बनें, अर्थात् अति करने से बचें और संयम से काम लें। सांस्कृतिक मूल्यों के अनुसार जो ऋतुगामी है वह समझिए कि ब्रह्मचारी ही है। अविवाहित युवाओं के लिए तो खैर हर प्रकार से ब्रह्मचर्य पालन अनिवार्य है । भारतीय संस्कृति में यदि 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्यपूर्वक विद्या प्राप्ति का संदेश दिया गया है तो इसका वास्तव में बहुत व्यापक उद्देश्य है। जिसने युवावस्था में ब्रह्मचर्य का मन, वचन, कर्म से समुचित पालन किया, उसका पूरा जीवन ही सौन्दर्यता से परिपूर्ण, आनन्दमय और तेजस्वी हो जाता है; महापुरुषों के जीवन-चरित्र पढ़ने से इसके ढेरों प्रमाण मिल जाते हैं। आज अगर उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रवाह के चलते ब्रह्मचर्य विनाश की परिस्थितियाँ दिख रही हैं तो यह हम सबके लिए ही चिन्ता का विषय होना चाहिए। यहाँ पृष्ठ सीमा के नाते ब्रह्मचर्य पालन की विस्तार से चर्चा न करके सिर्फ कुछ सांकेतिक बातें ही कही गई हैं। वैसे जिनको ब्रह्मचर्य पालन का वैज्ञानिक तरीक़े से महत्त्व जानना हो, उन्हें डॉ. सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार लिखित ‘ब्रह्मचर्य-संदेश’ नामक पुस्तक एक बार अवश्य पढ़नी चाहिए।
इतनी चर्चा के बाद यह समझ में आ जाना चाहिए कि सौन्दर्य के लिए स्वास्थ्य-रक्षा कितनी ज़रूरी है। यह बात ज़रूर है कि यहाँ आहार, निद्रा, व्यायाम आदि के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं दी जा रही है। ऐसा इसलिए है कि स्वास्थ्य-रक्षा के विविध पहलुओं पर लेखक की ‘स्वदेशी चिकित्सा’ नामक पुस्तक में पर्याप्त चर्चा की गई है। कुल मिलाकर उपरोक्त सभी बातों का संक्षेप में यही उद्देश्य है कि इस पुस्तक में सुझाए गए सौन्दर्यवर्धक उपायों को आज़माते हुए स्वास्थ्य-रक्षा के लिए आहार-विहार भी पर अवश्य ध्यान देना चाहिए।
बढ़ सकता हैं मुखड़े का आकर्षण
तमाम लोग अपने चेहरे के मूल ढाँचे को लेकर ही दुखी रहते हैं और सुडौलता लाने के चक्कर में प्लास्टिक सर्जरी तक की सहायता लेते हैं। परंतु मेरे विचार से चेहरे की प्राकृतिक बनावट के प्रति चिंता बेमानी है और कई अर्थों में यह हमारे विकृत सौन्दर्यबोध को ही दर्शाता है। परमात्मा ने स्वस्थ माँ-बाप द्वारा एक स्वस्थ व्यक्ति के रूप में जैसे चेहरे-मोहरे के साथ हमें इस संसार में भेजा है, उस पर संतुष्ट रहने में ही असली सुख है। सुन्दरता के तथाकथित मानदण्डों पर खरा उतरने के लिए कृत्रिम साधनों की सहायता लेने से आपके मन की मुराद पूरी तरह से पूरी तो खै़र नहीं ही हो सकती, उल्टे कई बार नुकसानदेह नतीजों का भी सामना करना पड़ सकता है। विशेष अपरिहार्य परिस्थितियों में कृत्रिम साधन प्रयोग किए जाएं तो ही उचित कहा जा सकता है।
दरअसल चेहरे के सौन्दर्य का असली अर्थ यह है कि चेहरा स्वस्थ हो तथा ओज और ताज़गी से परिपूर्ण रहे। चेहरे के स्वास्थ्य और सौन्दर्य सुधारने का यह भी अर्थ नहीं है कि यह कोई एकदम से अलग विषय है। सही बात यह है कि अगर आपका शरीर स्वस्थ है तो स्वास्थ्य की झलक चेहरे पर भी दिखाई ही देगी। हाँ, थोड़ी अतिरिक्त देखभाल करके चेहरे की चमक, दमक और रौनक अवश्य बढ़ायी जा सकती है।
इस प्रकरण में इसी उद्देश्य से कुछ ऐसे देशी और हानिरहित नुस्खे़ प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जिन्हें आप अपना आहार-विहार दुरुस्त रखते हुए आज़माएंगे तो कील-मुहाँसे, दाग़-धब्बे, झाँई-झुर्री जैसी तमाम समस्याओं से मुक्ति मिलेगी और आप सुहाने मुखड़े के मालिक बन जाएंगे।
नुनुस्खों का इस्तमाल करते समय ध्यान रखने वाली एक विशेष बात यह है कि जिन नुस्ख़ों में तेल या चिकनाई की चीज़ें मिली हों, उनका प्रयोग ठण्ड के मौसम में विशेष लाभप्रद रहता है**************************************
चेहरे पर काली मिट्टी का लेप लगाएं। यह ऊपरी चिकनाहट दूरकर मृत त्वचा को हटाती है।
**************************************
नीम की जड़ को महीन पीसकर लेप करने से मुहाँसे जल्दी ठीक होते हैं।
**************************************
मुहाँसे अधिक बड़े-बड़े व ज़्यादा संख्या में हों तो सिरके में कलौंजी पीसकर रात में मुँह पर लगाकर सो जाएं। सुबह धो डालें। इसके बाद ओस की बूँदों को साफ़ रुई में भिगोकर मुहाँसों पर फेरें।
**************************************
एक छोटा चम्मच जौ का आटा, आधा चम्मच चंदन पाउडर, चुटकी भर हल्दी लेकर नींबू के रस में घोल बनाएं तथा चेहरे पर लगाकर आधे घण्टे बाद धो दें। यह काफ़ी असरदार नुस्ख़ा है।
**************************************
हरी ककड़ी के रस में नींबू या संतरे का रस मिलाकर चेहरे पर लगाएं और लगभग आधे घण्टे बाद धो डालें।
**************************************
पहले चेहरा ठण्डे पानी से धो लें और फिर गर्म पानी में तौलिया गीला करके चेहरे पर रखकर भाप सेंक करें। इसके तुरंत बाद ठण्डे पानी से भीगा तौलिया चेहरे पर रखें। चेहरे को तैलीय न होने दें। कुछ दिनों के प्रयोग से मुहाँसों से आसानी से छुटकारा मिल जाएगा।
**************************************
धनियाँ, वच, लोध और कूठ को बराबर-बराबर मात्रा में लेकर महीन पीसकर एक में मिलाकर रख लें। इसमें से एक चम्मच चूर्ण लेकर पानी में गाढ़ा घोल बनाएं। अब पत्थर पर पानी के साथ जायफल घिसकर एक छोटे चम्मच की मात्रा में घोल में मिला दें। इस मिश्रण को शाम के समय चेहरे पर लेप करके एक घण्टे तक लगा रहने दें। फिर हल्के हाथों से मसलकर छुड़ा दें और सो जाएं। सबेरे उठकर चेहरा धो डालें। उचित आहार-बिहार के साथ कुछ दिनों तक यह प्रयोग करने से मुहासों की समस्या से निजात मिल जाएगी।
**************************************
लाल चंदन, मंजीठ, लोध, अगर, खस, कूठ व सुगंधबाला सबको बराबर-बराबर मात्रा में लेकर अलग-अलग चूर्ण बनाकर कपड़छन करके शीशियों में रख लें। जब भी उपयोग में लाना हो तो सब चूर्ण आधा-आधा चम्मच लेकर गुलाबजल के साथ पीसकर लेप बना लें। अब एक चम्मच दूध में 1-2 पंखुड़ी केसर की घोंटकर इस लेप में मिलाएं और साथ ही 4-6 बूँद नींबू का रस भी मिला लें।
इस लेप को चेहरे तथा गर्दन पर लगाकर कुछ देर के लिए सूखने दें और फिर लेप छुड़ाकर चेहरा पानी से धो डालें। यह नुस्ख़ा चेहरे की रौनक बढ़ाने के लिए काफ़ी कारगर है।
**************************************
त्वचा का स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए आँवला, कच्चा नारियल, मक्खन-मिश्री, सलाद, संतरे जैसी चीज़ें विशेष लाभप्रद हैं। चूने के पानी का शर्बत त्वचा को स्वस्थ रखने में मदद करता है। इसको बनाने का तरीक़ा यह है कि खाने का चूना पानी में भिगोकर 4-5 दिन तक रख दें। इसे दिन में 2-3 बार साफ़ लकड़ी से हिलाकर चला दिया करें। पाँचवें दिन ऊपर का निथरा हुआ पानी अलग कर लें। इसमें शक्कर मिलाकर शर्बत योग्य चाशनी बनाकर ठण्डा करके बोतल में भर लें। इस शर्बत को भोजन के बाद दोनों समय एक-एक चम्मच की मात्रा में 40 दिनों तक सेवन करना चाहिए।
**************************************
जिन महिलाओं के चेहरे व होठों के ऊपर घने रोएं हों उन्हें बेसन, मैदा, शहद और नींबू का रस 1-1 चम्मच लेकर एक में मिलाकर चेहरे पर लेप करना चाहिए। लेप सूखने लगे तो मसलकर छुड़ा दें। इस प्रयोग से धीरे-धीरे अनावश्यक बालों की समस्या से निजात मिल जाएगी। इसके अलावा चेहरे की त्वचा भी मुलायम, चिकनी और चमकीली बन जाएगी।
**************************************
नींबू का रस और तुलसी के पत्तों का रस समान मात्रा में मिलाकर झाँइयों पर लगाने से झाँइयों से मुक्ति मिल जाती है। इससे मुहासे भी समाप्त होते हैं।
**************************************
दो चम्मच कच्चे दूध में गाढ़ा लेप बनने लायक़ चिरौंजी पीसकर सायंकाल चेहरे पर लेप करके कुछ देर तक सूखने के लिए छोड़ दीजिए। सूखने पर मसलकर छुड़ा दें और पानी से चेहरा धो लें, धीरे-धीरे निखार आने लगेगा।
**************************************
चेहरे पर निखार लाने के लिए एक चम्मच चूने के पानी में थोड़ा शहद मिलाकर लेप करें और लगभग आधे घण्टे बाद चेहरा धो दें।
**************************************
काली कसोंदी का रस नींबू और तुलसी पत्तों के रस में मिलाकर ताँबे की कटोरी में भरकर धूप में रख दें। यह घोल जब गाढ़ा हो जाए तो मुहासों पर लगाएं, काफ़ी लाभ होगा।
**************************************
नींबू, ककड़ी तथा खीरे का रस समान मात्रा में मिलाकर स्नान से पूर्व चेहरे पर मलें तथा कुछ समय बाद स्नान करें। चेहरे की रौनक बढ़ेगी।
**************************************
दो चम्मच दही में एक चम्मच मसूर की दाल भिगोएं। दाल फूल जाए तो पीसकर इसमें थोड़ा सा मक्खन और चुटकी भर हल्दी मिलाकर चेहरे व गर्दन पर लगाएं। लगभग आधे घण्टे बाद गुनगुने पानी से चेहरा धो दें। नियमित यह प्रयोग करने से शनै:शनै: चेहरे की स्निग्धता और चमक बढ़ेगी।
**************************************
मलाई में नींबू का रस मिलाकर 10-15 मिनट तक चेहरे की मालिश करें। कुछ देर रुककर चेहरा धो दें। कुछ दिनों के प्रयोग से चेहरा दमकने लगेगा।
**************************************
आँखों के नीचे काले गड्ढे पड़ जाएं तो एक भाग नींबू के रस में चार भाग पानी मिलाकर मालिश करते हुए धोएं। थोड़े दिनों में स्याहपन मिटने लगता है।
**************************************
एक भाग नमक में चार भाग कच्चा दूध मिलाकर सोने से पूर्व रात में चेहरे की मालिश करें। सबेरे चेहरा धो डालें।
**************************************
एक-दो चम्मच बेसन में तिल का तेल मिलाकर चेहरे पर लगाएं तथा मलकर छुड़ा दें। चेहरे की आभा बढ़ेगी।
**************************************
एक चम्मच नींबू के सूखे छिलकों के महीन चूर्ण में एक चम्मच बेसन मिलाकर ठण्डे कच्चे दूध में फेंटकर गाढ़ा लेप तैयार करें। प्रतिदिन यह लेप चेहरे पर लगाकर कुछ देर बाद पानी से धो दें। यह प्रयोग चेहरे को आकर्षक बनाता है।
**************************************
मसूर की पिसी हुई दाल में थोड़ी हल्दी और जैतून का तेल मिलाकर उबटन बनाएं तथा चेहरे और शरीर पर मलें। कुछ देर बाद स्नान करें। त्वचा साफ़ और स्निग्ध होती है।
**************************************
एक चम्मच बेसन, एक चुटकी आटा, 5-6 बूँद नींबू रस तथा 5-6 बँूद गुलाबजल एक में मिलाकर गाढ़ा लेप बनाएं। अगर त्वचा रूखी या कठोर दिखती हो तो इसमें आधा चम्मच मलाई मिला लें। इस लेप को चेहरे पर मलें तथा कुछ देर बाद ताज़े पानी से धो दें। कुछ दिनों के प्रयोग से चेहरे की चमक बढ़ जाएगी।
**************************************
चेहरे पर चेचक के दाग़ हों तो मुरदार-श्वंग में नींबू का रस मिलाकर लगाना चाहिए। इस प्रयोग से गहरे दाग़ होंगे तो हल्के हो जाएंगे और हल्के दाग़ होंगे तो समाप्त हो जाएंगे।
**************************************
नींबू के एक चम्मच रस में एक पके टमाटर का रस मिलाकर चेहरे पर मलें तथा एक घण्टे बाद ठण्डे पानी से धो दें। धीरे-धीरे चेहरे की लाली बढ़ने लगेगी।
**************************************
चेहरे की रौनक बढ़ाने के लिए संतरे के सूखे छिलकों के साथ दो-तीन बादाम की गिरी दूध की मलाई के साथ सिल पर महीन घोंट-पीसकर चेहरे पर मलें। सूख जाने पर मसलकर छुड़ा दें तथा चेहरा धो डालें।
**************************************
एक चम्मच नींबू के रस में कुछ बूँद जैतून का तेल मिलाकर रात में सोने से पूर्व चेहरे पर लगाएं। इससे रंग में निखार आएगा तथा त्वचा की कठोरता, रूखापन दूर होंगे।
**************************************
खीरा व ककड़ी का रस मिलाकर मलने से आँखों के नीचे का स्याहपन मिटता है।
**************************************
मैदे में दूध मिलाकर गाढ़ा-गाढ़ा लेप चेहरे पर मलें। इससे चेहरे की मैल साफ़ होगी तथा मुलायमियत बढ़ेगी।
**************************************
ग्लिसरीन, नींबू का रस तथा गुलाबजल बराबर मात्रा में लेकर घोल बनाकर रख लें। सर्दी के दिनों में चेहरे पर लगाने का यह अच्छा लोशन है। त्वचा की ख़ुश्की दूर तो होगी ही, त्वचा के रोग भी ख़त्म होंगे।
**************************************
चेहरे या शरीर के खुले हिस्सों की त्वचा को ठण्डी हवा के असर से बचाने के लिए सफ़ेद मक्खन, बादाम व सफ़ेद मोम को एक में घोंट-पीसकर क्रीम बनाकर चेहरे पर लगाएं। इसे 5:2:5 के अनुपात में मिलाकर बनाना चाहिए।
**************************************
संतरे और नींबू के छिलके सुखाकर महीन पीसें तथा इसमें दूध मिलाकर गाढ़ा लेप बनाएं। इसे चेहरे या पूरे शरीर पर लगाकर सूखने दें फिर स्नान करें। शरीर कान्तिमान होने लगेगा।
**************************************
नींबू व संतरे के सूखे छिलकों के चूर्ण में दही, बेसन तथा गुलाबजल मिलाकर लेप बनाएं तथा चेहरे पर मलें। मुहासे और झाँइयों से छुटकारा मिलेगा। यदि इसे पूरे शरीर में उबटन की भाँति लगाया जाए तो त्वचा का रंग साफ़ होकर मुलायमियत आती है।
**************************************
नींबू का रस, शहद, मैदा और बेसन चारों समान मात्रा में लेकर किंचित पानी के साथ गाढ़ा लेप बनाकर कुछ देर तक चेहरे पर अच्छी तरह मलें। नियमित प्रयोग से कुछ दिनों में चेहरे से अनावश्यक रोएं साफ़ हो जाएंगे।
**************************************
चावल, जौ व बाजरी का आटा, नींबू का रस तथा हल्दी- सभी समान भाग में लेकर थोड़ा जैतून का तेल मिलाकर उबटन बनाएं तथा चेहरे व पूरे शरीर पर लगाकर मसलें। कुछ देर बाद धो दें या स्नान कर लें। इस प्रयोग से त्वचा का रंग साफ़ होता है। काफ़ी अच्छा नुस्ख़ा है।
**************************************
सूखे आँवलों के कपड़छन चूर्ण में उचित मात्रा में दही मिलाकर चेहरे पर अच्छी तरह लगाकर सूखने दें। सूखने के बाद लेप को मसलकर छुड़ा दें। अब गर्म पानी से भीगे तौलिए से चेहरे की सेंक करें। कुछ दिनों के प्रयोग से मुहासे तो ठीक ही होंगे, चेहरा साफ़, सुंदर, चमकदार भी दिखेगा।
**************************************
रात सोने से पूर्व चेहरे पर मलाई मलने से स्निग्धता बढ़ती है।
**************************************
लाख, मंजीठ, मुलहठी, पलाश के फूल, लाल चंदन, कुसुम, खस, पद्माख, बड़ की छाल, नीलकमल, पाकर की मूल, कमलकेशर, हल्दी, दारूहल्दी, मेंहदी तथा अनंतमूल- सभी 4-4 तोला लें।
सभी औषधियों को जौकुट चूर्ण बनाएं तथा ढाई किलो जल में मिलाकर चतुर्थांश क्वाथ करें। अब इसे छानकर 16 तोला तिल तेल, 32 तोला बकरी का दूध तथा 1-1 तोला मुलहठी, मंजीठ, लाख पतंग व केशर का कल्क मिलाकर धीमी आँच पर तेल सिद्ध करें।
यह तेल चेहरे की फुंसियों, दाग़, मुहासों आदि के लिए काफ़ी लाभप्रद है। यह किंशुकादि या कुंकुमादि तेल के नाम से बना-बनाया आयुर्वेदिक दवा की दुकानों पर भी मिलता है।
**************************************
रीठे का छिलका, मालकांगनी, कायफल, रेवन्दचीनी व हल्दी, प्रत्येक 1-1 तोला लेकर चूर्ण बनाकर इसमें 12 तोला जौ का आटा मिलाकर रख लें।
इसमें से आवश्यकताभर चूर्ण लेकर सरसों का तेल और थोड़ा पानी मिलाकर मुख पर लेप करें तथा आधा घण्टा बाद मसलकर छुड़ा दें और पानी से चेेहरा धो डालें। नियमित नित्य यह प्रयोग करने से दाग़, धब्बे, मुहाँसे, झाँइयाँ आदि मिटकर चेहरे पर निखार आ जाता है।
**************************************
बरगद की जटा, लाल चंदन, मंजीठ, सेमल का काँटा, मसूर की, कपूर- सभी 5-5 तोला तथा पीली सरसों 10 तोला व केसर 1 तोला लेकर कपड़छन चूर्ण बनाकर रख लें।
इस चूर्ण का थोड़े से जल में उबटन बनाकर चेहरे पर लेप करने से मुहाँसे, दाग़ आदि दूर होकर त्वचा की चमक बढ़ जाती है।
**************************************
निंबौली की मिंगी- 500 ग्राम तथा नीम की पत्ती- 500 ग्राम लेकर अलग-अलग महीन पीस लें। दोनों को अलग-अलग बटोरकर दो गोला सा बनाएं। अब इन दोनों गोलों को एक शीशे के पात्र में रखकर थोड़ा-थोड़ा पानी डालते हुए शीशे की डंडी से चलाएं। जब गाढ़ा अवलेह सा बन जाए तो चलाना बंद कर दें तथा इसमें 1 किलो गुलाबजल डालकर पुन: चलाएं। जब सब चीज़ें एकरस हो जाएं तो पात्र पर ढक्कन लगाकर उसकी दरारें मैदे के गाढ़े लेप से बंद कर दें तथा 21 दिन तक वैसे ही पड़ा रहने दें। इसके बाद ऊपर निथरे हुए तरल पदार्थ को अलग करके बोतलों में भर लें। इस अर्क को मुहाँसों पर लगाने से मुहाँसे समाप्त हो जाते हैं।
**************************************
नींबू का रस, शुद्ध ग्लिसरीन तथा गुलाबजल सभी 1:2:3 के अनुपात में लेकर मिला लें तथा इसमें नींबू रस का पचासवां भाग सुहागे का फूला मिश्रण करके शीशी में रख लें।
इस मिश्रण को प्रतिदिन रात्रि में चेहरे पर मलने से दाग़, झुर्री, मुहाँसे समाप्त होते हैं तथा चेहरे का सौन्दर्य बढ़ता है।
**************************************
सफ़ेद चंदन- 10 ग्राम, रसकपूर- 6 रत्ती, बादाम की गिरी- 20 ग्राम तथा गुलाबजल- 300 ग्राम की मात्रा में लें।
चंदन घिसकर तथा बादाम पीसकर, रसकपूर तथा गुलाबजल सहित सबको एक में मिलाकर छानकर शीशी में रख लें। नित्य प्रति इसमें से एक चम्मच मिश्रण लेकर चेहरे पर मलें तथा 10 मिनट बाद धो दें। कुछ दिन में चेहरे की कांति बढ़ने लगेगी। साधारण दाग़, झुर्रियाँ आदि भी मिटेंगे।
**************************************
रीठे का छिलका-15 तोला, बादाम की खली- 40 तोला तथा चावल का आटा- 3 तोला। सबके बारीक बने मिश्रण में आधा तोला लोहबान पीसकर मिलाकर रख लें।
इसमें से दो तोला चूर्ण लेकर पानी में लेप बनाकर चेहरे पर ख़्ाूब मलें। 15-20 मिनट बाद छुड़ाकर गुनगुने जल से धो दें। हफ्ते भर में चेहरे की सुंदरता बढ़ने लगेगी और दाग़, कील दूर होने लगेंगे।
**************************************
चने का बेसन- 200 ग्राम, संतरे के सूखे छिलकों का चूर्ण- 10 ग्राम, कपूर- 10 ग्राम, पिसी हल्दी- 25 ग्राम, मसूर की दाल का महीन चूर्ण- 200 ग्राम, सफ़ेद चंदन-10 ग्राम, जटामांसी- 10 ग्राम, गुलाब के सूखे फूल- 10 ग्राम।
सबका बारीक कपड़छन चूर्ण बनाकर बाद में कपूर मिलाकर रख लें। एक बार में 200 ग्राम चूर्ण लेकर इसमें 5 ग्राम सरसों का तेल और किंचित पानी मिलाकर मुख और शरीर पर उबटन करें। इससे साँवलापन कम होकर रंग में निखार आता है तथा मुहाँसे आदि भी दूर होते हैं।
**************************************
कचूर घिसकर लेप करने से मुहाँसों से निजात मिलती है।
**************************************
सिरके में कलौंजी के बीजों को पीसकर रात के समय लेप करके कुछ देर बाद चेहरा धो दें। एक हफ्ते में ही मुहाँसे और दाग़ आदि से छुटकारा मिलने लगता है।
**************************************
गुलाबजल में संतरे के छिलकों का चूर्ण मिलाकर मुहाँसों पर लेप करने से मुहाँसे तो दूर होते ही हैं, वर्ण भी सुधरता है।
**************************************
नीम की छालरहित जड़ को घिसकर मुहाँसों पर लगाने से हफ्ते भर में लाभ मिल जाता है।
**************************************
दूध में सेमल के काँटों का बारीक चूर्ण पीसकर लेप बनाकर चेहरे पर लगाते रहने से मुहाँसे तथा कीलें नष्ट हो जाती हैं।
**************************************
लाल चंदन, मसूर, मंजीठ, लोध्र तथा लहसुन की कोंपल लेकर एक साथ पानी में महीन पीसकर रात को मुहासों पर लगाकर सो जाएं तथा सबेरे धो दें। कुछ दिन में लाभ मिल जाएगा।
**************************************
काली मिर्च, लाल चंदन तथा जायफल समान भाग लेकर पानी में पीसकर चेहरे पर लगाने से मुहाँसों से छुटकारा मिल जाता है।
**************************************
5 तोला मसूर की दाल तथा एक तोला हल्दी में एक नींबू का रस मिलाकर पानी के साथ पीसें तथा चेहरे पर लेप करें। मुहाँसे ठीक होंगे।
**************************************
हल्दी की गाँठ पानी के साथ पत्थर पर घिसकर लेप लगाने से चेहरे पर निखार आता है।
**************************************
केसर, लाख, लाल चंदन, मंजीठ तथा मुलहठी 1-1 तोला लेकर कल्क करके 16 तोला तिल तेल व 32 तोला बकरी का दूध और इतना ही पानी मिलाकर धीमी आँच पर पकाएं। तेल सिद्ध हो जाए तो ठण्डा करके छानकर रख लें। इस तेल की मालिश से चेहरे की कान्ति बढ़ती है। एक हफ्ते में ही मुहाँसे, झाँइयाँ आदि भी मिट जाती हैं।
**************************************
दूध में हल्दी की गाँठ भिगोकर फूलने दें। फूल जाए तो इसे बारीक पीस लें और सरसों का तेल और मैदा मिलाकर गाढ़ा लेप बनाएं। इसे स्नान के समय चेहरे तथा शरीर पर लगाने से त्वचा साफ़, चिकनी और कान्तिमान होती है।
**************************************
पिंडखजूर को पानी में अच्छी तरह पकाकर मसलकर छान लें। अब इस छने हुए रस को पुन: धीमी आँच पर इतना पकाएं कि यह जमने लायक़ हो जाए। इसे सुरक्षित पात्र में रख लें। इसमें कूठ व नमक मिलाकर या अकेले ही चेहरे पर लेप करने से चेहरे की चमक बढ़ जाती है, दाग़ आदि मिटते हैं।
**************************************
दूध की मलाई में थोड़ी हल्दी मिलाकर नित्य रात को चेहरे पर लगाकर मलें तथा आधा एक घण्टे बाद मसलकर छुड़ा दें व धो डालें। कुछ दिनों में चेहरा कान्तिमान हो उठेगा।
**************************************
दही, बेसन, गुलाबजल, पिसी हल्दी, संतरे के छिलकों का चूर्ण- सभी समान मात्रा में मिलाकर फेंटकर लेप बनाएं तथा चेहरे पर लगाकर सूखने दें। पश्चात् चेहरा धोकर साफ़ तौलिए से पोंछ दें। एक-दो माह में चेहरे के सभी दाग़-धब्बे मिटकर चेहरा कान्तिमान होने लगेगा।
**************************************
कच्चे आलू का रस चेहरे पर मलने से चेहरे की त्वचा स्वस्थ, चमकदार बनती है।
**************************************
नित्य तुरंत दुहे गए दूध का झाग चेहरे पर मलकर आधा घण्टा बाद गुनगुने पानी से धो दें। चेहरे की चमक बढ़ने लगेगी।
**************************************
बादाम की गिरी- 5 तोला, सफ़ेद चंदन- 1 तोला, गुलाब के फूल- 1 तोला, कपूर- 4 ग्राम, केशर- 2 ग्राम, कस्तूरी- 200 मि.ग्राम लेकर इन सबका महीन चूर्ण बनाकर एक में मिलाकर रख लें। इसमें से 4 ग्राम चूर्ण को पानी में गाढ़ा लेप बनाकर मुख पर मलें तथा सूख जाने पर पानी से धो दें। कुछ दिनों में चेहरा चमक उठेगा।
**************************************
गुलाबजल में 5 तोला बादाम की मिगी महीन पीसकर इसमें इत्र गुलाब, इत्र हिना, इत्र केवड़ा तथा चंदन का तेल-चारों आधा-आधा तोला तथा 120 मि.ग्रा. रसकपूर पिसा हुआ मिलाकर खरल में एकरस कर लें। चेहरा साफ़ करके यह लेप मलने से कुछ दिनों में चेहरा दमक उठता है।
**************************************
नीम की छाल, बकाइन की छाल, सूखा धनिया, सफ़ेद चंदन, खिल्ला चना, मुरदारश्वंग, सफ़ेद काशगिरी ; सब समभाग लेकर कूट पीसकर कपड़छन चूर्ण बना लें तथा गाय के दूध में गाढ़ा घोंटकर चौड़े मुँह की शीशी में रख लें।
रात को सोते समय इसमें से आवश्यकतानुसार मिश्रण लेकर गुलाबजल में मिलाकर चेहरे पर मलें तथा सो जाएं। सबेरे गुनगुने पानी से मुँह धो डालें। कुछ दिनों में मुहासों से निजात मिल जाएगी और चेहरा साफ़ हो जाएगा।
**************************************
हल्दी और लाल चंदन भैंस के दूध में पीसकर लेप लगाने से मुहाँसे ठीक होते हैं और चेहरे में चमक आती है।
**************************************
आम की गुठली, प्रियंगु, सफ़ेद चंदन, नागकेसर, मंजीठ और रसौंत को गाय के गोबर के रस में पीसकर लेप करने से त्वचा की विकृतियाँ ठीक हो जाती हैं और वर्ण निखरता है।
**************************************
संतरे के रस में तुलसी के पत्तों को पीसकर लेप करें। सूख जाने पर गुनगुने पानी से चेहरा धोएं। मुहासे आदि दूर होते हैं। यह प्रयोग सोते समय करें और सबेरे चेहरा धोएं तो बेहतर है।
**************************************
तुलसी पत्र का स्वरस और नींबू स्वरस समभाग मिलाकर मलने से चेहरे की त्वचा निरोगी बनती है।
**************************************
दूध की 1 चम्मच मलाई लेकर उसमें 4-6 बूँद शहद और एक चम्मच नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर लगाकर मलें। आधा घण्टा बाद पानी से धो दें। एक माह नियमित करने से चेहरे पर निखार आ जाएगा। बाद में एक-दो दिन के अंतर पर भी करते रहेंगे तो आपको किसी बाज़ारू क्रीम वगै़रह की ज़रूरत नहीं महसूस होगी।
**************************************
घीक्वार के पत्ते का रस चेहरे पर लगाकर लगभग आधे घण्टे बाद धोएं। मुहासे, फुंसियों से छुटकारा मिलेगा।
**************************************
कच्चे नारियल का पानी चेहरे पर मलने से त्वचा साफ़ और कान्तिपूर्ण बनती है।
**************************************
चेहरे की त्वचा रूखी हो तो मुल्तानी मिट्टी में खीरे का रस, टमाटर का रस, गुलाबजल, चंदन का महीन चूर्ण, ग्लिसरीन तथा नारियल का पानी मिलाकर लेई सा बनाकर लेप करें। सूखने पर पानी से धो दें। एक-दो दिन के अंतर पर भी यह प्रयोग करते रहें तो चेहरे पर निखार आने लगेगा।
**************************************
नींबू का रस, खीरे का रस व गुलाबजल समान मात्रा में मिलाकर प्रतिदिन चेहरे पर मलने से मुहाँसों से छुटकारा मिलता है।
**************************************
खीरे के रस में बंदगोभी के पत्तों का रस तथा शहद मिलाकर लगाएं तथा आधा घण्टा बाद चेहरा धो डालें। चेहरे की कालिमा कम होगी और निखार आएगा।
**************************************
चेहरा तैलीय हो तो 1 चम्मच संतरे का रस तथा दो चम्मच मुलतानी मिट्टी का लेप बनाकर लगाएं तथा सूखने के बाद धो दें।
**************************************
त्वचा रूखी-सूखी रहती हो तो आधा चम्मच शहद में आधा चम्मच जैतून का तेल तथा आधा चम्मच पिसी मुलतानी मिट्टी मिलाकर गाढ़ा लेप बनाकर चेहरे पर लगाएं तथा आधा घण्टा बाद धो दें।
**************************************
फटे होंठों पर अरण्डी के तेल में गुलाबजल व शहद मिलाकर लगाने से लाभ हो जाता है।
**************************************
मधुमक्खी का मोम 1 चम्मच, बादाम रोगन 2 चम्मच तथा गुलाबजल आधा चम्मच एक में मिश्रण करके लगाने से होंठों की फटन ठीक हो जाती है।
**************************************
सूर्य की गर्मी से चेहरे की त्वचा झुलस जाए तो दही में गुलाबजल मिलाकर लगाएं। खीरा के रस में ग्लिसरीन मिलाकर लगाने से भी फ़ायदा होगा।
**************************************
त्वचा तैलीय हो, साँवलापन हो और मुहाँसे निकल रहे हों तो 1 चम्मच मसूर की दाल, 1 चम्मच चंदन चूर्ण, 1 चम्मच हरदार, 3 चम्मच हल्दी, आधा चम्मच जायफल, 1 चम्मच छारछबीला, 1 चम्मच कूठ, 1 चम्मच चिरौंजी तथा तिहाई चम्मच कपूर लेकर कूट-पीसकर मिश्रण बना लें। इसमें से ज़रूरत भर चूर्ण लेकर पानी में उबटन सा बनाएं और सबेरे तथा रात में चेहरे पर लगाकर सूखने तक छोड़ दें। पश्चात् लेप छुड़ाकर पानी से चेहरा धो लें। कुछ दिन नियमित यह प्रयोग आज़माएं, पर्याप्त लाभ मिलेगा।
**************************************
सेब का रस 1 चम्मच, तुलसी के पत्तों का रस 1 चम्मच तथा नींबू का रस 2 चम्मच मिलाकर चेहरे पर मलें तथा लगभग आधा घण्टा बाद गुनगुने पानी से धो दें। दिन में दो बार यह प्रयोग करते रहने से धीरे-धीेरे दाग़, धब्बे, मुहाँसे कील, झाँइयाँ, काले घेरे आदि दूर होकर चेहरे में निखार आ जाता है।
**************************************
नींबू व संतरे के सूखे छिलके, नीम व गुलाब की सूखी पत्तियाँ समान मात्रा में तथा इन सबके वज़न के बराबर मुलतानी मिट्टी लेकर कपड़छन चूर्ण बनाकर रख लें। इसमें से आवश्यकतानुसार चूर्ण पानी में लेप बनाकर चेहरे व गर्दन पर लगाएं तथा सूखने पर धो दें।
इस नुस्ख़े के इस्तेमाल से चेहरे की त्वचा दाग़, धब्बे रहित होकर स्निग्ध और चमकीली बनती है। 17
**************************************
25 ग्राम नीम की छाल, 50 ग्राम गेरू, 2 ग्राम वच तथा 10-10 ग्राम की मात्रा में लाल चंदन, मंजीठ, बायबिडंग, खदिर, खरेटी, हल्दी, आंबाहल्दी, दारूहल्दी, लोध्र, जटामांसी व बावची लेकर कूट-पीसकर कपड़छन चूर्ण बनाकर रख लें। इसमें से एक बड़ा चम्मच चूर्ण लेकर थोड़े दूध और केसर की 4-6 पुंखुड़ी के साथ घोंटकर चेहरे और गर्दन पर लगाकर एकाध घण्टे बाद जब सूख जाए तो मसलकर गुनगुने पानी से धो दें।
इस प्रयोग से चेहरे के दाग़, झाँइयाँ मुहाँसे आदि मिटते हैं तथा त्वचा में उज्वलपन आता है। आँंखों के नीचे का कालापन भी इससे समाप्त होता है। यह योग ‘फेस केयर लेप’ के नाम से बना-बनाया बाज़ार में उपलब्ध है।
**************************************
बड़ के पीले पत्ते, कूठ, लाल चंदन, चमेली के फूल, काला चंदन तथा लोध्र दो-दो तोला लेकर महीन चूर्ण करें तथा पानी में लेप बनाकर चेहरे पर लगाएं। एकाध घण्टे बाद धो डालें। इससे त्वचा में निखार आएगा।
**************************************
माजूफल को चावल के धोवन के साथ घिसकर लेप बनाकर चेहरे पर लगाने से मुहाँसे ठीक होते हैं।
**************************************
मुहासों की समस्या से ग्रस्त लोगों को दिन में कई बार चेहरे को ठण्डे पानी से धोना चाहिए तथा नहाने से पहले ज्वार का आटा व बेसन को दूध में मिलाकर लेप करना चाहिए।
**************************************
जौ, बाजरा, चावल का आटा तथा नींबू का रस, पाँंचों 1-1 चम्मच लेकर मिश्रण करके इसमें थोड़ा सा जैतून का तेल डालकर गाढ़ा उबटन सा बनाएं तथा चेहरे और शरीर पर मलें। कुछ देर बाद धो दें। इससे रंग साफ़ होता है। काफ़ी प्रभावशाली नुस्ख़्ाा है।
**************************************
आधा चम्मच दूध की मलाई में 4-6 बँूंद नींबू का रस मिलाकर रात में चेहरे पर मलें और लगभग आधे घण्टे बाद पानी से धो दें। इसके बाद सोने से पूर्व चेहरे पर जैतून के तेल की धीरे-धीरे मालिश करें। यह पूरा प्रयोग करने से पूर्व चेहरे को गुनगुने पानी से धोकर तौलिए से पोंछ लें तो बेहतर रहेगा कुछ दिनों तक यह उपाय करने से चेहरे की झुर्रियाँ, दाग़ आदि मिटकर त्वचा कांतिमान हो जाती है। साबुन का प्रयोग बंद रखें।
**************************************
गुलाब की ताज़ा पंखुडियाँ पीसकर थोड़ी ग्लिसरीन मिलाकर लेप सा बनाएं और होंठों पर नियमित रूप से कुछ दिन लगाएं। होंठों की कालिमा धीरे-धीरे कम होने लगेगी। लिपिस्टिक का इस्तेमाल बंद रखें।
**************************************
दही से निकाले मक्खन में केसर मिलाकर होंठों पर मलने से होठों की लालिमा बढ़ती है।
**************************************
गर्मी के दिनों में तैलीय त्वचा हो तो चंदन की लकड़ी गुलाबजल में और खुशक त्वचा हो तो दूध में घिसकर चेहरे पर लगाएं। घण्टे भर बाद ठण्डे पानी से धो दें। इस प्रयोग से कुछ ही दिनों में चेहरे से दाग़, धब्बे मिटते नज़र आएंगे।
**************************************
चेहरे को आभावान बनाने के लिए गुलाब के फूल की पंखुडियों को दूध में पीसकर लेप करें। कुछ समय बाद गुनगुने पानी से धो दें।
**************************************
नीम की ताज़ी पत्तियाँ पीसकर चेहरे पर लेप करें, इससे त्वचा निरोगी रहेगी।
**************************************
एक चम्मच चमेली के तेल में 3 ग्राम सोहागा मिलाकर रात को सोते समय चेहरे पर मलें तथा सबेरे बेसन का गाढ़ा लेप लगाकर मसलकर पानी से धो दें। कुछ दिनों में मुहाँसे ग़ायब होना शुरू हो जाएंगे।
**************************************
शुक्ति पिष्टी और टंकण एक-एक तोला चूर्ण मिलाकर रख लें। थोड़ा सा यह चूर्ण शहद में मिलाकर लगाते रहने से कील-मुहाँसे समाप्त होते हैं।
**************************************
सेंधा नमक, सफ़ेद सरसों, लोध्र और वचा -दो-दो तोला लेकर महीन चूर्ण बनाकर रख लें। इसमें से एक चम्मच चूर्ण पानी में गाढ़ा लेप बनाकर मुहाँसों पर लगाएं। कुछ दिन में लाभ होने लगेगा।
**************************************
चिरौंजी, पीली सरसों और मसूर की दाल समान मात्रा में लेकर महीन पीसकर रख लें। इस चूर्ण को आवश्यक मात्रा में दूध के साथ गाढ़ा उबटन बनाकर चेहरे पर और इच्छा हो तो शरीर पर भी लगाएं। जब सूखने लगे तो मसलकर छुड़ा दें और चेहरा गुनगुने पानी से धो दें या स्नान कर लें।
इस उबटन से त्वचा में निखार आता है और दाग़-धब्बे व मुहाँसे समाप्त होते हैं। यह उबटन ‘चंद्रप्रभा उबटन’ के नाम से बाज़ार में बिकता है।
**************************************
नाभि में तेल लगाते रहने से होंठ नहीं फटते।
**************************************
मक्खन में नमक मिलाकर होंठों पर लगाने से होंठ नहीं फटते।
**************************************
होंठों पर जैतून का तेल मलने से फटे होंठ जल्दी ठीक हो जाते हैं।
**************************************
थोड़ा सा नमक, शुद्ध घी में मिलाकर दिन में दो-तीन बार नाभि में मलने से होंठों का फटना ठीक होता है और होंठ मुलायम रहते हैं।
**************************************
तरबूज़ के बीजों को पीसकर लगाने से होंठ कोमल हो जाते हैं।
**************************************
चने की थोड़ी सी दाल दूध में रात भर भिगोएं तथा सबेरे पीसकर चुटकी भर हल्दी और कुछ बुँदे नींबू रस की मिलाकर चेहरे पर लेप करके लगभग आधे घण्टे बाद छुड़ा दें। चेहरे की रंगत साफ़ होने लगेगी।
**************************************
तुलसी की सूखी पत्तियों का चूर्ण बनाकर चेहरे पर मलने से दाग़-धब्बे मिटकर चेहरे की कांति बढ़ती है।
**************************************
ताँबे के बरतन में नींबू का रस निचोड़कर 24 घण्टे तक रखिए। इसके बाद इसमें इतनी ही मात्रा में काली तुलसी तथा काली कसौंदी का रस मिलाकर धूप में गाढ़ा होने के लिए रख दें। इस लेप को चेहरे पर लगाने से चेहरे के सौन्दर्य में निखार आता है। इसे स्तनों पर लगाने से वे पुष्ट व उन्नत बनते हैं।
**************************************
काली मिर्च व गोरोचन का लेप बनाकर लगाने से मुहाँसे ख़त्म होते हैं, त्वचा की चमक बढ़ती है।
**************************************
बिजौरा नींबू की जड़, मन: शिला और घी को गाय के गोबर के रस में पीसें तथा चेहरे पर लेप करें। धीरे-धीरे चेहरा दाग़-धब्बों से मुक्त होकर आभावान बनता है।
**************************************
रात में सोते समय भौंहों पर और बरौनियों के ऊपर जैतून के तेल की हल्के- हल्के मालिश करें। कुछ दिनों में भौंहें और बरौनियाँ घनी होने लगेंगी।
**************************************
संतरे के सूखे छिलके का चूर्ण ,जौ का आटा तथा आँवले का चूर्ण तिल के तेल में मिलाकर उबटन करने से चेहरे पर निखार आने लगता है।
**************************************
अरहर की दाल पानी में भिगोकर रात भर के लिए रख दें और सबेरे इसे पीसकर कुछ बूँदें नींबू के रस की मिलाकर चेहरे सहित अन्य सभी खुले अंगों पर मलें। कुछ ही दिनों में त्वचा की रंगत सुधरने लगेगी।
**************************************
चेहरे की त्वचा साँंवली हो तो 2 बादाम की गिरी पीसकर इसमें एक चम्मच शहद, 2-3 बँूंद नींबू का रस तथा ज़रा सा दूध मिलाकर गाढ़ा लेप बनाकर लगाएं। लगभग आधे घण्टे बाद चेहरा धो दें।
**************************************
मुहासों से छुटकारा पाने के लिए दूध में बेसन मिलाकर रात को सोते समय चेहरे पर लगाएं तथा सबेरे गुनगुने पानी से धो दें। 20
**************************************
गोभी के पत्तों के रस में थोड़ा खमीर मिलाकर चेहरे व गर्दन पर लगाकर आधे घण्टे बाद ताज़े पानी से धो दें। धीरे-धीरे त्वचा की ख़्ाुश्की, झुर्रियाँ व कालिमा कम होने लगेंगी।
**************************************
मूली के रस में मक्खन मिलाकर चेहरे पर मलें तथा आधा घंटा बाद गुनगुने पानी से धो दें। धीेरे-धीेरे चेहरे की झुर्रियाँ कम होंगी तथा चमक बढ़ेगी।
**************************************
दूध में गाजर व नींबू का रस मिलाकर नियमित रूप से चेहरे पर लगाने से साँवलापन कम होता है।
**************************************
होंठों को मुलायम बनाए रखने तथा उन्हें फटने से बचाने के लिए प्रतिदिन सबेरे नींबू, शहद और ग्लिसरीन का मिश्रण लगाएं तथा सूखने पर धो दें।
**************************************
प्रतिदिन रात में गुलाब की ताज़ा पंखुडियाँ पीसकर मलाई में मिलाकर होंठों पर लेप करें तथा सूखने पर धो दें। इससे होंठों की रंगत सुधरेगी तथा होंठ मुलायम बने रहेंगे।
**************************************
दूध की मलाई में शहद मिलाकर लगाने से नेत्रों के नीचे का कालापन मिटता है तथा होंठों की रंगत सुधरती है तथा वे मुलायम बने रहते हैं।
**************************************
तुलसी के पत्तों को दूध में पीसकर लगाने से झाँई मिटती है।
**************************************
सादा कच्चा दूध भी चेहरे पर मलने से चेहरा साफ़ और स्निग्ध होता है।
**************************************
जामुन की गुठलियों को पानी में पीसकर लेप करने से महाँसे ठीक होते हैं।
**************************************
अर्जुन वृक्ष की छाल, अखरोट की छाल, सेंधा नमक तथा मौलश्री की छाल का कपड़छन चूर्ण बनाएं तथा कंडे की राख मिलाकर रख लें। इसका मंजन करने से पीले, गंदे दाँत साफ़ और चमकीले बनते हैं।
**************************************
दिन में एक दो बार सरसों के तेल में थोड़ा नमक तथा हल्दी मिलाकर दाँतों, मसूड़ों की मालिश करते रहने से कृमिदंत आदि तमाम बीमारियाँ नहीं होतीं। यह दाँतों के लिए बेहद आसान, सस्ता और कारगर उपाय है।
**************************************
दो तोला दूध में चार कली लहसुन उबालकर चेहरे पर मलने से चेहरा खिल उठता है।
**************************************
पलकों पर सोते समय एरण्ड के तेल की हल्की मालिश करने से पलकें घनी होती हैं।
**************************************
दाँतों को स्वस्थ और सुन्दर बनाए रखने के लिए नियमित रूप से नीम या बबूल की दातून करना श्रेष्ठ उपाय है।
**************************************
दोनों समय भोजन के बाद आधा चम्मच सरसों के तेल में ज़रा सा बारीक पिसा नमक मिलाकर उँगली के सहारे दाँतों, मसूड़ों की मालिश करने से दाँत स्वस्थ और स्वच्छ बने रहते हैं।
**************************************
भोजन व नाश्ते के बाद 1 गिलास पानी में आधा चम्मच नमक घोलकर कुल्ला करते रहने से भी दाँत निरोगी रहते है।
दूध से दाढ़ी बनाने और नहाने की बात सुनकर शायद आपको अजीब लगे, पर है यह ज़ोरदार नुस्खा। देश के कुछ शहरों में तो दूध से दाढ़ी बनाने के बाक़ायदा सैलून ही खुल गए हैं। इतना ही नहीं इसके फ़ायदों को देखते हुए लोगों ने इस नुस्खों को और आसान और सुविधाजनक बनाने की दिशा में भी काम करना शुरू कर दिया है। इस नुस्खों को प्रचलन में लाने का असली श्रेय आज़ादी बचाओ आंदोलन के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री राजीव दीक्षित को जाता है। दरअसल स्वदेशी और स्वसंस्कृति के पक्ष में दिए गए अपने कई व्याख्यानों में उन्होंने इस नुस्ख़े का काफ़ी रोचक वर्णन किया है। इसी का नतीजा हुआ कि तमाम प्रतिष्ठित लोगों ने भी शेविंग क्रीम वगै़रह का बहिष्कार करके दूध से दाढ़ी बनाने की शुरूआत कर दी है।
दूध से दाढ़ी बनाने का सामान्य तरीक़ा यह है कि पहले आप हल्के गुनगुने पानी से चेहरा भिगो लीजिए, इसके बाद थोड़ा सा कच्चा दूध लेकर चेहरे पर अच्छी तरह मलिए। अब रेज़र चलाइए, एकदम चिकनी दाढ़ी बनेगी। दाढ़ी बनाने के बाद क्रीम वगै़रह लगाने की ज़रूरत एकदम समाप्त हो जाती है, क्योंकि कच्चा दूध अव्वल दर्जे़ का ’क्लीनिंग एजेंट’ है। कच्चे दूध के इस्तेमाल से चेहरे की स्निग्धता और सौन्दर्य में वृद्धि होगी, सो अलग।
अब आइए, दूध से स्नान करने का तरीक़ा जानिए। यह तरीक़ा भी एकदम आसान है। एक नींबू एक छोटी कटोरी भर कच्चे दूध में निचोड़ दीजिए, बस अच्छे से अच्छे साबुन से भी बेहतर स्नान सामग्री तैयार है। नींबू निचोड़ने के बाद जब दूध फट जाए तो एक साफ़ सूती कपड़े का टुकड़ा इसमें भिगोकर शरीर पर अच्छी तरह रगड़ते हुए फेरिए और स्नान कर लीजिए। यह है आपका एकदम- सौ प्रतिशत सम्पूर्ण स्नान !
इस तरह आप साबुनों के नुकसानदेह मायाजाल से तो बचेंगे ही, तमाम तरह के चर्मरोगों से भी निजात मिलेगी।
सुन्दरता के प्रतीक काले-घने-घुँघराले बाल
किसी ज़माने में सिर के एकाध बाल सफे़द दिख जाने या खल्वाट पड़ना शुरू हो जाने पर लोग इसे बुज़ुर्गियत के आगमन की सूचना मान लेते थे। कल्पना कीजिए कि यदि आज भी इसे कसौटी माना जाए तो क्या स्थिति होगी। दृश्य कुछ ऐसा होगा कि यौवन की दहलीज़ पर क़दम रखने जा रहे देश के अधिकांश नौनिहाल सीधे बुज़ुर्गों की जमात में खड़े दिखाई देंगे। दरअसल असमय बालों का पकना व झड़ना अब इतनी आम बात है कि इसे बुज़ुर्गियत की निशानी मानना बेमानी हो चुका है।
असल में इस तरह की समस्याएँ आधुनिक जीवन-शैली की सौग़ातें हैं। खान-पान के अलावा भाँति-भाँति के रसायनों के मिश्रण से बने कृत्रिम साबुन, तेल, शैम्पू आदि अनगिनत सौन्दर्य प्रसाधनों ने इन समस्याओं में और इज़ाफ़ा किया है। फिलहाल इस प्रकरण में आधुनिक जीवन-शैली की मीमांसा के बजाय समस्या का समाधान प्रस्तुत करना मुख्य उद्देश्य है, इसलिए आगे बालों की विभिन्न समस्याओं को लेकर कुछ आसान उपायों पर ही चर्चा की जाएगी।
बालों को स्वस्थ रखने के लिए आहार-विहार पर ध्यान देना सबसे ज़रूरी बात है। स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी आहार-विहार की पर्याप्त चर्चा विभिन्न प्रकरणों में आ चुकी है। किसी विशेष बीमारी की वजह से बालों के पकने या झड़ने की समस्या हो तो उसका इलाज कराएं। बालों की समस्याओं से निजात पाने के लिए होम्योपैथी में बहुत ही कारगर इलाज मौजूद है, बशर्ते लक्षणों से मेल खाती उपयुक्त दवा का चयन हो जाए। जड़ी-बूटियों से आंतरिक चिकित्सा के लिए कुछ कारगर नुस्ख़े तो ख़्ौर आगे दिए ही जा रहे हैं।
आंतरिक चिकित्सा के साथ-साथ बालों की बाहरी देखभाल भी ज़रूरी है। पहली बात यह कि सिर की मालिश प्रतिदिन या एकाध दिन के अंतर पर अवश्य करें। इससे त्वचा में रक्त संचार सुचारु रूप से होगा और बालों की जड़ों तक पोषण आसानी से पहुँचेगा। मालिश के लिए आए दिन तेल बदल- बदलकर न इस्तेमाल करें। कोई एक अपने अनुकूल अच्छा तेल चुन लें और नियमित इसी से मालिश करें। सिर धोने के लिए रसायनों से बने साबुन-शैम्पुओं का जितना ही कम प्रयोग करें, उतना ही अच्छा है। सिर धोने की कई देशी विधियाँ आगे दी गई हैं, उन्हें अपनाएँ तो अच्छा लाभ मिलेगा। धूम्रपान, क्रोध, अधिक रात्रि जागरण, वनस्पति घी, तेल, मिर्च, मसालों से जितना बच सकें, उतना ही बेहतर रहेगा। खान-पान का सुधार रखते हुए भोजन में आँवले का नियमित प्रयोग बालों की सेहत के लिए विशेष लाभप्रद है। आँवले के स्थान पर आमलकी रसायन का भी प्रयोग करके लाभ उठाया जा सकता है। इतनी सावधानियों के साथ आप ज़रूरी लगे तो नीचे दिए जा रहे नुस्ख़े आज़माएं और बालों की समस्याओं से निजात पाएं।
**************************************
असली हाथी दाँत को तवे पर भूनकर भस्म बनाएं। अब रसौत लेकर इसे पत्थर के सिल पर बकरी के दूध की सहायता से घिसकर लेई तैयार करें। इस लेई में समभाग हाथी दाँत का भस्म मिलाकर गंज पर लगाएं।
यह योग कहीं भी बालों के चकत्तों के रूप में गिर जाने पर लाभप्रद है। बकरी के दूध के स्थान पर नीम का तेल तथा हाथी दाँत न मिल पाने पर काले सुरमे का भी प्रयोग किया जा सकता है ।
**************************************
आापके बाल झड़ना शुरू हो रहें हो तो आँवले के रस में शहद मिलाकर सिर में मालिश करें ।
**************************************
आँवला चूर्ण मेंहदी के साथ पीसकर बालों में लेप करने से बाल घने और काले होते हैं ।
**************************************
पिसी हुई सूखी मेंहदी 1 कप, कत्था 1 चम्मच, दही 1 चम्मच, नींबू का रस 1 चम्मच,पिसा कॉफी पाउडर 1 चम्मच, आँवला चूर्ण 1 चम्मच, ब्राह्मी बूटी का चूर्ण 1 चम्मच ,सूखे पोदीने का चूर्ण 1 चम्मच ।
इन सभी चीज़ो़ं को एक में मिलाकर गाढ़ा लेप बन सके, इतने पानी में भिगो दें ।
दो-ढाई घण्टे बाद इस लेप को सिर में बालों की जड़ों तक लगाएं और धण्टे भर बाद सूख जाने पर सिर को मुलतानी मिट्टी या बेसन से धो दें। इस प्रयोग से आपके बाल काफ़ी सुंदर दिखेंगे । बालों में रंग न लाना हो तो कत्था और कॉफी़ पाउडर का इस्तेमाल न करें । बालों को सुंदर,लंबे,घने और काले बनाए रखने का यह एक अच्छा उपाय है, बशर्ते साबुन का प्रयोग बंद कर दिया जाए ।
**************************************
पाँच अच्छे रसदार काग़जी़ नींबू के रस में 20 ग्राम क़लमी शोरा अच्छी तरह खरल में घुटाई करके रख लें । इस मिश्रण को गंज वाले स्थान पर लेप करके दो घण्टे बाद किसी अच्छे आयुर्वेदिक शैम्पू या साबुन से सिर धो दें । पश्चात् नारियल तेल से मालिश करें। एक डेढ़ माह में गंज मिटना शुरू हो जायेगा। इसी के साथ 4-5 ग्राम आमलकी रसायन पानी या दूध से सुबह-शाम सेवन करें। यह बहुत कारगर नुस्ख़ा है ।
**************************************
उचित आहार-विहार के साथ एक चम्मच साबुत काले तिल तथा एक चम्मच भृंगराज पंचांग कपड़छन चूर्ण करके फाँक लें तथा ऊपर से ताज़ा पानी पिएं। 6 माह तक निरंतर यह प्रयोग करने से बालों का असमय पकना व झड़ना रुकेगा इसी के साथ सायंकाल सोने से पूर्व सूर्यतप्त नीले नारियल तेल की भी मालिश करें तो अच्छा परिणाम मिलेगा।
**************************************
भंृगराज पंचांग छायाशुष्क करने के बाद कपड़छन चूर्ण बनाकर काँच के बरतन में रखकर उसमें ताज़े भृंगराज का रस इतना डालें कि रस 4 अंगुल ऊपर तक आ जाए। अब इसे लोहे के खरल में घुटाई करके सुखा लें। इस प्रकार 21 या कम से कम 7 भावनाएं भृंगराज स्वरस का देकर तैयार इस चूर्ण में इसका आधा बहेड़ा चूर्ण तथा पाँचवां हिस्सा हरड़ चूर्ण अच्छी तरह मिलाकर बादाम के तेल से तर करके कुल मिश्रण के बराबर मिश्री मिलाकर काँच के पात्र में रख लें। इस योग को 6-6 ग्राम प्रात: तथा सायं दूध के साथ सेवन करना चाहिए। एक सप्ताह बाद मात्रा बढ़ाकर 9 ग्राम तथा तीसरे सप्ताह से 10 ग्राम प्रतिदिन सेवन करें। 41 दिनों तक नियमित रूप से यह प्रयोग करने से सफ़ेद बाल काले होने लगते हैं, बालों का झड़ना बंद होता है तथा इंद्रलुप्त का रोग समाप्त होता है। बहुत प्रशंसित योग है।
**************************************
उपरोक्त नुस्खों की भाँति एक अन्य योग यह है कि भाँगरा तथा त्रिफला चूर्ण समभाग मिलाकर इसमें सफ़ेद साबुत तिल इतना ही पीसकर मिलाएं तथा बाद में सबके बराबर मिश्री मिलाकर प्रयोग करें। 6 माह तक सेवन करने से बालों के तमाम रोग ठीक हो जाते हैं। यह योग नेत्रों के लिए भी अतिशय लाभप्रद है।
**************************************
200 ग्राम सूखे आँवले, 150 ग्राम शिकाकाई, 100 ग्राम कपूर कचरी, 100 ग्राम नागरमोथा, 40 ग्राम रीठा तथा 40 ग्राम कपूर लेकर सबका महीन कपड़छन चूर्ण बनाकर रख लें।
इसमें से 50 ग्राम चूर्ण लेकर लगभग 400 ग्राम उबलते पानी में 15-20 मिनट तक भिगोएं। तदनन्तर मसल-छानकर इस जल से बालों में जड़ों तक मलें। इस प्रयोग से बाल मज़बूत होते हैं, उनका झड़ना रुक जाता है तथा काले, मुलायम बने रहते हैं। इससे लीक-जूँ भी नष्ट होती हैं।
**************************************
आँवला क्वाथ, इमली का हिम क्वाथ, मेंहदी का स्वरस, भाँगरे का स्वरस, मुलहठी क्वाथ, जटामांसी क्वाथ तथा नारंगी के छिलकों का क्वाथ- प्रत्येक 1-1 किलो, दूध 2 किलो व तिल का तेल डेढ़ किलो।
इसे तेलपाक विधि से तैयार करके रख लें। इस तेल को सायं सोते समय बालों की जड़ों में मलना चाहिए। बालों का टूटना, सफ़ेद होना, सिर की रूसी आदि दूर होते हैं।
**************************************
चमेली के पत्ते, चित्रक के पत्ते, लाल कनेर के पत्ते तथा करंज के पत्ते- प्रत्येक 250-250 ग्राम लेकर जल में पीसकर कल्क बनाएं। अब 4 किलो तिल का तेल लेकर इसमें कल्क मिलाकर 16 किलो पानी डालकर पकाएं। तेल सिद्ध हो जाने पर छानकर रख लें।
इस तेल की मालिश से सिर या दाढ़ी के, जहाँ भी बाल उड़ गए हों, वहाँ जल्दी ही पुन: उगने लगते हैं। इस तेल की कुछ दिनों तक नियमित रूप से रुई के फाहे से मालिश करनी चाहिए।
**************************************
जटामांसी तथा वटवृक्ष के अंकुर 50-50 ग्राम, गिलोय स्वरस 4 किलो व तिल तेल 1 किलो लेकर तेल सिद्ध करें।
इस तेल की इंद्रलुप्त के स्थान पर धीरे-धीरे मालिश करनी चाहिए तथा नस्य लेना चाहिए। यह काफ़ी असरदार तेल है।
**************************************
1 किलो अनार के पत्तों के रस में 125 ग्राम अनार का कल्क व आधा किलो सरसों का तेल मिलाकर तेलपाक विधि से तेल सिद्ध करके रख लें।
इस तेल की मालिश से इंद्रलुप्त तथा खालित्य विकार नष्ट होते हैं।
**************************************
हरा भृंगराज, हरा आँवला तथा ताज़े हरे मेंहदी के पत्ते, सभी 250-250 ग्राम की मात्रा में लेकर कूटकर उनका रस निकाल लें। अब रस में इसके वज़न के बराबर पानी मिलाएं तथा 200 ग्राम कपूर कचरी व 200 ग्राम बालछड़ भी कूटकर इसमें मिला दें और रात भर पड़ा रहने दें। सबेरे पूरा घोल धीमी आँच पर पकाएं और जब यह आधा रह जाए तो उतारकर छान लें। अब 200 ग्राम तिल का तेल धीमी आँच पर पकाते हुए तीनों दवाओं का क्वाथ थोड़ा-थोड़ा करके डालते जाएं। जब सारा रस जल जाए और मात्र तेल बच रहे तो उतारकर निथारने के बाद गाद अलग करके तेल बोतलों में भर लें।
इस तेल की मालिश रात में सोने से पूर्व बालों की जड़ों में करनी चाहिए तथा साथ ही कम-से-कम सौ बार कंघी करें। यह तेल बालों के लिए अत्यन्त हितकारी है।
**************************************
गिलोय-आधा किलो, शतावरी चूर्ण-320 ग्राम, गोखरू चूर्ण-320 ग्राम, बाराहीकन्द-400 ग्राम, शुद्ध भिलावा-640 ग्राम, छिलकारहित तिल-320 ग्राम, चित्रकमूल-200 ग्राम, काली मिर्च-160 ग्राम, सोंठ -160 ग्राम, पीपल-160 ग्राम, मिश्री-1 किलो 400 ग्राम, शहद-700 ग्राम, विदारीकन्द-320 ग्राम तथा गोघृत-350 ग्राम।
पहले भिलावे तथा तिल को मिलाकर चूर्ण बनाएं। पश्चात् काष्ठौैधियों का चूर्ण इसमें मिलाकर खरल करके एकरस कर शक्कर मिश्रित करके रख लें।
इसमें से 3-4 ग्राम की मात्रा दिन में दो बार घी तथा शहद के साथ सेवन करें।
यह योग खालित्य, इंद्रलुप्त आदि अनेक रोगों में अत्यन्त हितकर है।
**************************************
बाल चकत्तों के रूप में उड़ गए हों, गंज हो या पक रहे हों तो निम्न चिकित्साक्रम अपनाना चाहिए -
1. 1 ग्राम आमलकी रसायन, 2 ग्राम मिश्री के साथ प्रात: तथा इतनी ही मात्रा सायं खाली पेट पानी से सेवन करें।
2. इसके 1 घण्टे बाद 3 ग्राम शतावरी चूर्ण 10 ग्राम त्रिफला घृत में मिलाकर दूध के साथ प्रात: तथा इसी तरह सायं सेवन करें।
3. त्रिफला, काले तिल तथा भृंगराज सभी समभाग लेकर चूर्ण बनाकर इसके बराबर पिसी मिश्री मिलाकर रख लें। इसमें से 10 ग्राम चूर्ण की एक मात्रा भोजन के बाद लें।
4. सिर में प्रतिदिन सायंकाल सोने से पूर्व भृंगराज तेल की मालिश करें।
**************************************
यूँ चाय पीना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह है। परंतु यदि आप आदतवश चाय पीते ही हैं तो चाय बनाने के बाद चाय की पत्ती का एक अच्छा इस्तेमाल कर सकते हैं। उबली हुई चाय पत्ती को फेंकने के बजाय इसे पुन: उबालकर छान लें और ठण्डा होने दें। अब इसमें नींबू का रस मिलाकर बालों में लगाएं तथा मल-मलकर सुखाएं, फिर धो डालें। इससे बाल साफ़ और चमकदार होते हैं।
**************************************
नींबू, संतरे का रस और दही मिलाकर बालों में मलें और पानी से धो दें। यह प्रयोग बालों को सुन्दर और घना बनाने में उपयोगी है।
**************************************
किसी खेत या तालाब में साफ़ जगह पर खोदकर 1 फुट नीचे की मिट्टी निकालकर रख लें। काली मिट्टी हो तो अति उत्तम। आवश्यकताभर यह मिट्टी पानी में गलाकर कंकड़-पत्थर छानकर साफ़ घोल बनाएं। इस घोल से नित्य सिर धोने से बाल खिल उठते हैं और घने, लम्बे, मुलायम बने रहते हैं।
**************************************
100 ग्राम आँवला, 6 आम की गुठलियाँ, 40 ग्राम अनार के छिलके, 100 ग्राम जवाकुसुम के फूल, 50 ग्राम नीम की पत्तियाँ, 50 ग्राम मेंहदी तथा 8 बड़े चम्मच नींबू का रस लेकर 2 लीटर नारियल तेल में डालकर लगभग आधा घण्टा तक पकाएं। पकने के बाद इसे तीन दिन रखा रहने दें और फिर छानकर बोतलों में भर लें। इसी अनुपात में इसे कम या ज़्यादा भी बनाया जा सकता है।
रात को सोते समय इस तेल की सिर में मालिश करनी चाहिए। पैरों के तलवों में भी इस तेल की दबाव देकर मालिश करें। बालों को पोषण मिलेगा और तमाम केश रोग दूर होंगे। एक-दो दिन के अन्तर पर भी इस प्रयोग को कर सकते हैं।
**************************************
दही में नींबू का रस मिलाकर बालों में मलें तथा धूप में सुखाएं। सूखने पर धो दें। इससे बाल हल्के-फुल्के और फूले-फूले से रहेंगे।
**************************************
यदि आप खारे पानी वाले इलाके में रहते हों तो शैम्पू आदि करने के बाद बालों को लाल सिरके से धोएं।
**************************************
शैम्पू में थोड़ी सी दही मिलाकर बालों में मलकर 10-15 मिनट बाद धोने से आप के बाल चमकदार दिखेंगे।
**************************************
यदि डाई करने या रंगने की वजह से बालों में रूखेपन की शिकायत हो तो दूध में केला मथकर बालों में लगाएं। पका पपीता भी लगा सकते हैं। इससे रूखापन दूर हो जाएगा।
**************************************
आँवला, शिकाकाई, रीठा, नीम की छाल, मुलतानी मिट्टी, अच्छी जगह से निकाली हुई काली मिट्टी 250-250 ग्राम तथा मेथी दाना 150 ग्राम, चंदन चूर्ण 100 ग्राम, छबीला पाउडर 150 ग्राम, मेंहदी 150 ग्राम व ब्राह्मी 100 ग्राम लेकर कूट-पीसकर कपड़छन चूर्ण बनाकर सुरक्षित रख लें।
इसमें से 4-5 चम्मच चूर्ण लेकर पानी में गाढ़ा लेप बनाकर बालों में मसलें। आधा घण्टा बाद हल्के गर्म पानी से बालों को धोएं। इस प्रयोग के साथ रात में सोते समय शुद्ध नारियल तेल या सूर्यतप्त नीला नारियल तेल बालों की जड़ों में मालिश करके लगभग 100 बार कंघी करें। कुछ दिनों तक लगातार यह प्रयोग करके चाहें तो एक दो दिन के अंतराल पर करते रहें। धीरे-धीरे बाल लंबे, मुलायम, काले, घने और खुबसूरत दिखने लगेंगे।
**************************************
भृंगराज की पत्ती, विधारा, अश्वगंधा तीनों समान मात्रा में कूट पीसकर कपड़छन चूर्ण बनाकर इसमें कुल चूर्ण का दो तिहाई हिस्सा पिसी मिश्री मिलाकर रख लें।
इस चूर्ण को एक दो चम्मच (लगभग आधा तोला) की मात्रा में सबेरे एवं रात को गरम दूध से सेवन करना चाहिए। दवा सेवन काल में ब्रह्मचर्य पालन के साथ तेल, गुड़, खटाई, मिर्च-मसाला कम सेवन करें।
धीरे-धीरे बालों का गिरना तथा सफ़ेद होना अच्छा होगा।
**************************************
यदि आप साबुन-शैम्पू से बचना चाहते हों तो बिना ज़्यादा खटराग किए आसान तरीक़ा यह है कि चने के बेसन से सिर धोएं। यदि सिर में ज़्यादा तेल लगा हो तो कटोरी में बेसन घोलकर पहले आधा घोल बालों में मलें और धो दें। पुन: शेष घोल को मलते हुए सिर धोएं। आपके बाल एकदम खिल उठेंगे। बेसन पूरे शरीर में मलकर स्नान करें तो शरीर में भी साबुन लगाने की आवश्यकता न रहेगी। उपलब्धता हो तो इसमें थोड़ा छाछ भी मिला सकते हैं। यह सोने पे सुहागा वाली बात होगी।
**************************************
आम की गुठली की मिगी तथा गुठली रहित आँवला, दोनों समान भाग लेकर सिल पर पानी के साथ महीन पीसकर गाढ़ा लेप सा तैयार करें और बालों में लगाएं। घण्टे भर बाद इसे धो डालें। यह प्रयोग बालों के लिए अत्यन्त हितकर है।
**************************************
गाय का गोबर 2 चम्मच, गोमूत्र 5 चम्मच, सूखे आंवले का चूर्ण 1 चम्मच, शतावरी का चूर्ण 1 चम्मच, अदरक का रस 1 चम्मच तथा ज़रूरत भर मुल्तानी मिट्टी लेकर सबका गाढ़ा लेप तैयार करें तथा बालों में जड़ों तक अच्छी तरह लगा लें। एकाध घण्टे बाद इसे धो दें।
यदि किसी विशेष रोग से ग्रस्त न होंगे तो इस प्रयोग से सिर के उड़े हुए बाल पुन: उग आएंगे।
**************************************
आँवला, रीठा, शिकाकाई तथा ब्राह्मी बराबर-बराबर वज़न में लेकर कूट-पीसकर एक में मिलाकर रख लें। लोहे की कढ़ाई में थोड़ा सा पानी गर्म करके इसमें 25 ग्राम यह चूर्ण तथा 5 ग्राम मेथी दाना डालकर अच्छी तरह चला दें और कढ़ाई उतारकर ढककर रख दें। दूसरे दिन इस पानी को छानकर इससे बालों को धोएं।
यह प्रयोग करते रहने से बाल लंबे, घने, काले बने रहते हैं।
**************************************
किसी बाह्य या आभ्यन्तर प्रयोग के साथ रात में सोते समय षड्बिन्दु तेल की 2-2 बूँद दोनों नासा-छिद्रों में डालते रहने से बालों के झड़ने तथा पकने की समस्या से जल्दी निजात मिलती है।
**************************************
मुलहठी, कूठ, उड़द, चिरौंजी और सेंधा नमक बारीक पीसकर शहद के साथ लेप बनाकर सिर में लगाने से रूसी की समस्या समाप्त हो जाती है।
**************************************
सरसों का तेल, कमल, मुनक्का, मुलहठी, घी और शहद मिलाकर बनाया गया लेप सिर में मलने से इंद्रलुप्त रोग समाप्त होकर बाल घने और मज़बूत बनते हैं।
**************************************
गोखरू और तिल के फूल बराबर मात्रा में पीसकर इसमें शहद तथा घी मिलाकर लेप करने से बाल तेज़ी से लंबे होते हैं।
**************************************
चित्रकमूल, चमेली के फूल, करंज के बीज, कनेर की जड़ को समान मात्रा में कल्क (लुगदी) बनाकर इसके चौगुने तेल में पकाएं। तेल सिद्ध हो जाए तो छानकर काँच की बोतल में रख लें। इस तेल की सिर में मालिश करते रहने से केश संबंधी अनेक बीमारियाँ धीरे-धीरे दूर हो जाती हैं और केश अच्छे बन जाते हैं।
**************************************
जैतून के तेल से सिर की मालिश करके गुनगुने पानी में भिगोकर निचोड़े गए तौलिए को सिर में लगभग आधा घण्टा बाँधें। इससे बालों की जड़ें मज़बूत होती हैं।
**************************************
बायबिडंग, कमल तथा गंधक का कल्क बनाकर इसमें गोमूत्र मिलाकर सरसों के तेल में पकाएं। जब तेल सिद्ध हो जाए तो छानकर रख लें। इस तेल की मालिश से जूँ नष्ट हो जाते हैं।
’ ’ ’ ’
बेल की जड़ पीसकर गोमूत्र मिलाकर लगाने से जूँ की समस्या से निजात मिल जाती है।
**************************************
बेर की एक पाव पत्तियों को थोड़े पानी में पीसकर एक दिन के लिए रख छोड़ें। अब इसे आधा किलो नारियल के तेल में इतना पकाएं कि सारा पानी जल जाए। पश्चात् इसे छानकर रख लें और नित्य लगाकर मालिश करें। इस तेल से बालों में चमक आती है तथा कालापन बढ़ता है।
शरीर और साँसों की बदबू भगाइए
शरीर और साँसों में बदबू आने के आंतरिक और बाह्य दोनों तरह के कारण हो सकते हैं। एक तो खान-पान की गड़बड़ी या किसी रोग की वजह से बदबू आ सकती है, दूसरे शरीर और दाँतों व मुँह की साफ़-सफ़ाई में की जा रही लापरवाही से भी बदबू की समस्या पैदा हो सकती है। बदबू की समस्या के यदि शारीरिक विकार, जैसे कि -दाँतों, मसूड़ों की ख़्ाराबी, पेट की गड़बड़ी, टॉन्सिल की सूजन-पस, नाक व साइनस विकार, श्वासनली व फेफड़ों के विकार, मुँह के छाले, रक्त की कमी, मधुमेह, यकृत-गुर्दों की बीमारी, पीनस आदि कारण हों तो आहार-विहार ठीक रखते हुए आवश्यक उपचार करना चाहिए और यदि बाह्य कारण हों, तो साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखते हुए निम्न उपाय अपनाए जा सकते हैं-
**************************************
बेलपत्र, आँवला, हरड़ चूर्ण मिलाकर शरीर में लेप करके कुछ देर बाद धो दें। इससे शरीर और पसीने की दुर्गंध से छुटकारा मिलता है।
**************************************
सुपारी, जायफल, शीतलचीनी, कपूर, लौंग तथा लता कस्तूरी को पान में रखकर ज़रा सा चूना लगाकर चबाने से मुख शुद्धि होती है तथा दुर्गंध ख़त्म होती है। यह पान मसूड़े, दाँत तथा जीभ के लिए भी हितकारी है। ध्यान रखने योग्य इतना सा है कि रक्त-पित्त के रोगियों, बहुत दुर्बल, भूखे, प्यासे तथा मूच्र्छा से पीड़ित लोगों के लिये पान सेवन वर्जित है।
**************************************
साँस में बदबू आती हो तो ऐसे लोगों को नीम की दातून नियमित करनी चाहिए। इसके अलावा खाने के बाद मुँह अच्छी तरह साफ़ रखें।
**************************************
दो चम्मच शहद को 1 गिलास पानी में घोलकर गरारा करने से हफ्ते भर में मुँह की दुर्गन्ध से आसानी से छुटकारा मिल जाता है। इसके साथ दाँत की सफ़ाई और खान-पान पर भी ध्यान दें तो उत्तम है।
**************************************
मुँह की दुर्गंध दूर करने के लिए दोनों समय भोजन के बाद अथवा यदा-कदा सौंफ़ चबाना चाहिए। इससे हाज़मा भी दुरुस्त होता है।
**************************************
चंदन, मुक्ता, हरड़, नागरमोथा, उशीर व लोध्र का लेप बनाकर शरीर में लगाने से दुर्गंध की समस्या से निजात मिलती है।
**************************************
कूठ, हरड़ और नागरपान समान मात्रा में पीसकर पानी के साथ लेप बनाकर शरीर में लगाने से दुर्गंध आनी बंद होती है।
**************************************
वच, कूठ, तज, छोटी इलायची, कमल की जड़, नागकेसर सभी सममात्रा में लेकर कपड़छन चूर्ण बनाएं और शहद में मिलाकर 250 मि. ग्रा. की गोलियाँ बना लें।
इन गोलियों को चूसने से मुँह की दुर्गंध दूर होकर सुगंध आने लगती है।
**************************************
लोध्र, अनार का छिलका, रीठे के पत्ते, धाय के फूल एक में मिलाकर पीसकर लेप करने से शरीर की दुर्गंध मिटती है
**************************************
स्वस्थ, सुन्दर त्वचा के लिए
शरीर की बनावट कितनी ही सुंदर हो, नैन-नक्श कितने ही आकर्षक हों, पर अगर त्वचा रोगग्रस्त हो तो सारी सुंदरता पर ग्रहण सा लग जाता है। हमारे देश में त्वचा को स्वस्थ, सुंदर बनाए रखने के लिए उबटन आदि की प्राचीन परंपरा रही है। कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों के बजाय प्राकृतिक और आयुर्वेदिक स्वदेशी उपायों को अपनाना ही ज़्यादा बेहतर है। इस प्रकरण में त्वचा को स्निग्ध, सुंदर, मुलायम और स्वस्थ बनाये रखने के लिए कुछ घरेलू नुस्ख़े प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इन्हें आज़माकर लाभ उठाया जा सकता है-
**************************************
आँवले के चूर्ण का उबटन शरीर पर लगाने से त्वचा साफ़, स्वच्छ तथा मुलायम होती है।
**************************************
स्नान से पूर्व एक गिलास पानी में दो चम्मच शहद तथा एक नींबू का रस घोलकर चेहरे और शरीर पर लगाकर कुछ देर के लिए छोड़ दें; इसके बाद स्नान करें। इससे त्वचा की स्निग्धता और चमक बढ़ती है तथा चर्मरोग भी दूर होते हैं।
**************************************
जौ, बाजरा तथा चने का आटा, सब 1-1 चम्मच लेकर इसमें 1 चम्मच नींबू का रस तथा 1 चम्मच हल्दी चूर्ण मिलाएं। अब जैतून का तेल इतना लें कि सब गाढ़ा उबटन बन जाए।
इस उबटन को चेहरे पर लगाएं या शरीर में, इससे त्वचा साफ़ और सुंदर बनती है। पूरे शरीर पर लगाना हो तो सभी चीज़ों की मात्रा बढ़ा लेनी चाहिए।
**************************************
त्वचा को निरोगी रखने के लिए पानी में नींबू का रस मिलाकर स्नान करना चाहिए।
**************************************
पानी में नींबू का रस तथा शहद मिलाकर नियमित पीने से रक्त साफ़ होता है तथा त्वचा रोग नहीं होते।
हालाँकि साँवली त्वचा को एकदम से गोरा बनाने के लिए अभी तक ऐसा कोई नुस्ख़्ाा नहीं बना है, परंतु जो लोग अपनी त्वचा का रंग साफ़ और कांतिमान बनाना चाहते हैं, उन्हें कोई भी उपचार अपनाने से पहले अपना आहार-विहार ठीक करना चाहिए। किसी भी हालत में क़ब्ज़ न होने दें। स्त्रियाँ अनियमित मासिक धर्म और प्रदर आदि की बीमारियों से बचें।
इतने उपाय के बाद 25 ग्राम सौंफ तथा 25 ग्राम कच्चा नारियल दिन में एक बार सबेरे या भोजन के बाद ख़्ाूब चबा-चबाकर नियमित 6 माह तक खाएं। इससे त्वचा में निखार आता है और त्वचा का रंग उजला होता है। गर्भवती महिलाएं पूरे गर्भकाल में यह प्रयोग करें तो संतान गोरी पैदा होती है।
इस आंतरिक प्रयोग के साथ अपने अनुकूल कोई बाह्य प्रयोग भी अपना सकते हैं।
**************************************
नींबू और संतरे का रस मिलाकर शरीर और चेहरे पर लगाने से मैल साफ़ होता है तथा रंगत सुधरती है।
**************************************
नींबू, आँवला और संतरे का रस दही में मिलाकर चेहरे तथा शरीर की त्वचा पर लगाकर मालिश करें और सूखने पर धो दें या स्नान कर लें। यह त्वचा को निखारने का बढ़िया नुस्ख़्ाा है। कुछ दिन नियमित प्रयोग करें।
**************************************
स्नान से कुछ समय पहले लगभग 100 ग्राम मिट्टी किसी कटोरे में पानी डालकर भिगो दें। मिट्टी गल जाए तो मसलकर पानी में एकरस कर लेप सा बना लें तथा इसे शरीर में साबुन की तरह मलकर लगाएं। इसके बाद स्नान करके साफ़ तौलिए से शरीर पोंछ लें। मिट्टी का यह प्रयोग त्वचा को स्वच्छ, मुलायम और चमकीला बनाता है। मिट्टी खेत में साफ़ जगह से एक फुट गहराई से खोदकर लेनी चाहिए।
**************************************
रात को जब सोने जाएं तो हाथ-पैर-मुँह आदि को अच्छी तरह धोकर पोंछ लें। इसके बाद ग्लिसरीन, गुलाबजल बराबर मात्रा में मिलाकर ऊपर से किंचित नींबू का रस डाल लें तथा हाथ, पैर और चेहरे पर मलें। इससे त्वचा स्वस्थ और चमकदार बनी रहती है।
**************************************
चुकंदर का रस, टमाटर का रस तथा पिसी हल्दी 4:4:1 के अनुपात में मिलाकर मलने से त्वचा का साँवलापन कम होता है।
**************************************
घमौरियों से परेशान हों तो बंदगोभी के रस में गुलाबजल मिलाकर लगाएं, राहत मिलेगी।
**************************************
दूध की मलाई और टमाटर का रस समान मात्रा में मिलाकर लेप करके लगभग आधे घण्टे बाद धो दें। इससे चेहरे के काले दाग़-धब्बे दूर होंगे।
**************************************
गोमूत्र, बेसन, पिसी हल्दी तथा मुलतानी मिट्टी सभी समान मात्रा में लेकर गाढ़ा लेप बनाएं। इसे चेहरे सहित पूरे शरीर पर लगाएं तथा 15 मिनट बाद धोकर गुनगुने पानी से स्नान कर लें। यह प्रयोग निरंतर कुछ दिनों तक करते रहने से शरीर का रंग निखर उठेगा तथा त्वचा कान्तिपूर्ण हो जाएगी।
**************************************
कच्चे या गुनगुने दूध में रुई का फाहा भिगोकर चेहरे तथा शरीर के विभिन्न अंगों की त्वचा पर हल्के-हल्के फेरिए। लगभग आधा घण्टा बाद ताज़े या गुनगुने पानी से धो दें। दाग़, धब्बे, झुर्रियाँ मिट जाएंगे तथा त्वचा स्निग्ध रहेगी।
**************************************
एक कटोरी में दूध लेकर इसमें चौथाई नींबू निचोड़ दें। जब दूध फट जाए तो इसे चेहरे के साथ-साथ शरीर के अन्य अंगों पर धीरे-धीरे मलें और कुछ देर बाद स्नान कर लें या धो दें। इससे त्वचा में मुलायमियत आएगी और त्वचा कांतिमय हो उठेगी।
**************************************
350 ग्राम पानी में 60 ग्राम इमली भिगोकर फूलने दें। तत्पश्चात् उसे मसलकर लेई सा बनाकर शरीर पर मलें और 15-20 मिनट बाद स्नान करें। कुछ दिनों में वर्ण में सुधार होने लगता है। इससे झाँई, दाग़, धब्बे भी ठीक होते हैं। गर्मियों में एक-दो दिन नागा करके तीन-चार सप्ताह तक यह प्रयोग करके देखें।
**************************************
यदि बरसात और गर्मी के दिनों में घमौरियों की समस्या से ग्रस्त हों तो बाह्य उपचार के साथ एक गिलास जौ के पानी (बार्ली वाटर) में एक नींबू निचोड़कर पिएं। यदि दिन में दो बार इसे कुछ दिन पिएं तो घमौरियों से जल्दी ही छुटकारा मिल जाएगा।
**************************************
जौ हल्का सा भूनकर पीस लें तथा इसमें थोड़ी हल्दी व कुछ बूँदें सरसों का तेल मिलाकर उबटन की भाँति चेहरे तथा शरीर पर लगाएं। त्वचा में धीरे-धीरे निखार आएगा।
**************************************
आँवला व सेब का मुरब्बा दोनों का नियमित रूप से प्रात: सेवन करते रहने से त्वचा की ख़्ाुश्की दूर होकर कांतिमान बनती है।
**************************************
नागकेसर, कुमुद, कमल के फूल तथा तगर और तालीसपत्र एक में पीसकर लेप करने से त्वचा कांतिमयता आती है।
**************************************
तगर की जड़, कूठ और तालीसपत्र को पानी में लेप बनाकर लगाने से त्वचा में निखार आता है।
**************************************
ताज़े पानी में तुलसी की पत्तियाँ तथा गुलाब के फूल की पंखुडियाँ डालकर कुछ देर पड़ा रहने दें। पश्चात् इस पानी से स्नान करें, शरीर में ताज़गी आएगी।
**************************************
सर्दी के दिनों में जैतून के तेल में थोड़ा सा नमक मिलाकर शरीर में मालिश करने से त्वचा मुलायम बनती है और यौवन में निखार आता है।
**************************************
गाय का गोबर, पीली सरसों, हल्दी, नागरमोथा, कपूर, चिरौंजी, लाल चंदन, छड़ीला, नारंगी का सूखा छिलका-सभी को महीन पीसकर चमेली के तेल में उबटन बनाएं तथा नित्य प्रति चेहरे सहित पूरे शरीर पर मलें। इससे दाग़-धब्बे समाप्त होकर त्वचा सुंदर बन जाएगी।
**************************************
नारियल के पानी में मलाई मिलाकर त्वचा पर मलने से दाग़-धब्बे मिटकर त्वचा की मुलायमियत बढ़ती है।
**************************************
चंदन पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा की चमक बढ़ती है।
स्त्रस्त्रियों की समस्या अविकसित, बेडौल वक्ष
स्त्री शरीर के लिए वक्ष-सौन्दर्य का विशेष महत्त्व है। सौन्दर्य की भी अपेक्षा माँ बनने और शिशु के स्वास्थ्य की दृष्टि से नारी शरीर में समुचित विकसित वक्ष का कहीं ज़्यादा महत्त्व है। यूँ यौवनावस्था में क़दम रखने के साथ ही स्तनों का भी समुचित विकास शुरू हो जाता है, परंतु यदि किसी कारण से स्तन अविकसित रह जाएँ या अति विकसित होकर बेडौल हो जाएं तो चिन्ता की बात हो जाती है।
स्तनों के अविकसित रह जाने के पीछे अत्यधिक दुबलापन, मासिक विकार, गर्भाशय की दिक़्क़तें, अधिक चिंता, तनाव जैसे अनेक कारण हो सकते हैं। इसी तरह शरीर पर मोटापा चढ़ने, आलसी जीवन बिताने, देर तक सोने की आदत, गरिष्ठ व ज़्यादा भोजन करने अथवा समय से पूर्व अत्यधिक काम-क्रीड़ाओं में लिप्त होने, कामुक चिन्तन करने जैसे कारणों से भी स्तन अविकसित, बेडौल व ढीले हो सकते हैं। फिलहाल यहाँ नवयुवतियों की इस गंभीर समस्या का समाधान करने के लिए कुछ स्वदेशी उपाय सुझाए जा रहे हैं, जिन्हें आज़माकर अविकसित या बेडौल स्तनों को स्वस्थ, सुडौल बनाया जा सकता है। इतना अवश्य ध्यान रखें कि किसी भी बाह्य चिकित्सा को अपनाते हुए शरीर के आन्तरिक विकार अवश्य दूर करें।
**************************************
कोई भी आंतरिक या बाह्य उपचार करते हुए स्तनों के समुचित विकास के लिए योगासन व व्यायाम अवश्य अपनाएं। स्तन सौन्दर्य की दृष्टि से सूर्य नमस्कार, धनुरासन, चक्रासन, भुजंगासन, शलभासन, उष्ट्रासन, पर्वतासन, हस्त पाश्र्वासन, गोमुखासन आदि विशेष लाभप्रद हैं। इनकी विधियाँ किसी योगासन विशेषज्ञ से सीखी जा सकती हैं।
**************************************
स्तन कम विकसित हों तो मालिश करने से काफ़ी लाभ होता है। तिल, जैतून या सरसों के तेल से स्तनों की नियमित मालिश करनी चाहिए। इसी के साथ ठण्डे तथा गर्म पानी की गीली पट्टी से बारी-बारी करके सेंकने से स्तन आसानी से पुष्ट होने लगते हैं।
**************************************
घृतकुमारी की जड़, गोरखमुण्डी, इन्द्रायण की जड़, अरण्डी के पत्ते, छोटी कटेरी 50-50 ग्राम तथा केले का पंचांग, सहिजन के पत्ते, पीपल के पेड़ की अन्तरछाल, अनार की जड़ व छिलका, खम्भारी की अन्तरछाल, कनेर व कूठ की जड़ 10-10 ग्राम लेकर मोटा-मोटा कूटकर 5 लीटर पानी में उबालकर क्वाथ करें। जब मात्र सवा लीटर पानी बच रहे तो उतारकर छान लें तथा इसमें सरसों व तिल का तेल 250-250 मि.ली. डालकर पुन: उबालें। सिर्फ़ तेल रह जाए तो उतारकर ठण्डा करके इसमें 15 ग्राम शुद्ध कपूर मिलाकर रख लें।
इस तेल को रात में सोते समय तथा सबेरे नहाने से एकाध घण्टे पहले स्तनों पर हल्के-हल्के मालिश करें। 2-3 माह में स्तन पुष्ट व सुडौल होने लगेंगे।
**************************************
गम्भारी की छाल 800 ग्राम तथा गम्भारी की छाल की लुगदी 200 ग्राम को सवा लीटर पानी में इतना उबालें कि चौथाई अंश शेष रह जाए। अब इसमें 800 मि.ली. तिल का तेल डालकर धीमी आँच पर पकाएं। जब सिर्फ तेल बच रहे तो उतार लें। इसी प्रकार से तीन बार गम्भारी छाल व कल्क(लुगदी) के साथ इस तेल को पकाएं। तीसरी बार में पकाने के बाद गर्म तेल में 15 ग्राम मोम डालकर उतारकर ठण्डा होने दें। कुछ ठण्डा होने के बाद तेल छानकर सुरक्षित रख लें।
इस तेल की प्रयोगविधि यह है कि इसमें कपड़े की पट्टी भिगोकर निचोड़ लें तथा स्तनों के ऊपर रखकर पान के पत्ते से ढँककर बाँध दें। प्रतिदिन सोते समय रात में यह प्रयोग करें। इससे धीेरे-धीरे स्तन पुष्ट, सुडौल होने लगेंगे। यह ‘श्रीपण्र्ाी तेल’ के नाम से बाज़ार में भी बिकता है।
**************************************
‘चेहरे का सौन्दर्य’ प्रकरण में वर्णित ताँबे के बरतन में नींबू का रस, तुलसी और कसौंदी से बनने वाला नुस्ख़्ाा प्रयोग करने से स्तन उन्नत, पुष्ट और सुडौल होते हैं।
कुछ नुस्खे़ हाथ-पैरों की देखभाल के लिए
एड़ियाँ फटती हों तो अरंडी का तेल, गुलाबजल तथा नींबू का रस समान मात्रा में मिलाकर एड़ियों पर दिन में दो-तीन बार मलें।
**************************************
मधुमक्खियों वाला मोम लेकर गर्म करें। पिघल जाए तो इसमें इसका आधा सरसों का तेल मिलाएं। अब किसी बरतन में पानी भरकर उसी में यह मिश्रण छान दें। जब यह पानी में नीचे बैठ जाए तो पानी फेंककर इसे किसी शीशी में रख लें। सोते समय रात में इस नुस्ख़्ो को एड़ियों में लगाने से एक सप्ताह में बिवाइयों में आराम मिल जाता है।
**************************************
रात को सोने से पहले नारियल का तेल गुनगुना करके बिवाइयों में लगाएं तथा मोजे पहनकर सो जाएं। सबेरे गर्म पानी में पैरों को 15 मिनट तक डुबोएं तथा किसी ब्रश से हल्के-हल्के रगड़कर एड़ियाँ साफ़ करें। इसके उपरांत भीगे पैरों को कपड़े से सुखाकर कोई तैलीय चीज़ लगा लें।
**************************************
एक चम्मच देशी मोम तथा एक चम्मच देशी घी गर्म करें। दोनों एकसार हो जाएं तो इस मिश्रण की गर्म-गर्म बूँदें बिवाइयों में टपकाएं। यह प्रयोग प्रतिदिन तब तक करें जब तक बिवाइयों से छुटकारा न मिल जाए।
**************************************
जैतून का तेल सहने योग्य गर्म करके नाख़ूनों को कुछ देर तक उसमें डुबाए रहिए। ऐसा कुछ दिनों तक करने से आपके नाख़्ाून मज़बूत होंगे।
**************************************
100 ग्राम सरसों के तेल में 25 ग्राम मोम डालकर गर्म करें तथा एक उबाल आने के बाद उतारकर ठण्डा होने से पूर्व ही किसी चौड़े मुँह के पात्र में रख लें।
इसे वैसलीन की तरह इस्तेमाल करें, त्वचा नहीं फटेगी। यदि फट रही हो तो ठीक हो जाएगी।
**************************************
पैरों में गट्टे (गोखरू) हों तो पीड़ित स्थान पर मेंहदी का गाढ़ा लेप लगाकर पट्टी बाँध दें। दो-तीन घण्टे बाद इसे खोलकर धो दें। कुछ दिनों के अन्तराल पर कुछ ही बार यह प्रयोग करने से गट्टे समाप्त हो जाएंगे।
**************************************
सर्दी के मौसम में या पानी में काम करने से हाथ-पैरों की त्वचा फटती हो तो ग्लिसरीन में नींबू का रस मिलाकर मलना चाहिए।
**************************************
नींबू के छिलके नाख़्ाूनों पर मलने से नाख़्ाून चमकदार होते हैं।
**************************************
हथेलियों, कोहनी और एड़ियों का कालापन मिटाने और मैल हटाने के लिए नींबू के छिलकों को प्रभावित हिस्सों पर घिसकर गुनगुने पानी से धोना चाहिए।
सौन्दर्य में निखार लाए मालिश
तेल मालिश का आनन्द जानना हो तो उगते सूरज की लाली में तेल मालिश कराते किसी पहलवान से मिलिए। मालिश से शरीर में जो उमंग-स्फूर्ति, कांतिमयता पैदा होती है, उसका एहसास कुछ दिन नियमपूर्वक मालिश करने के बाद ही जाना जा सकता है। मालिश इतना प्राकृतिक है कि पशु-पक्षी भी अपने-अपने तरीक़े से इसका लाभ लेते ही हैं। गधों को लोट-लोटकर मालिश का आनंद उठाते तो आपने देखा ही होगा। पशु बच्चे जनने के बाद चाट-चाटकर एक तरह से अपने बच्चों की मालिश ही करते हैं। घोड़े को खरारा देने की कितनी ज़रूरत पड़ती है, यह उसका मालिक ही जानता है। पक्षियाँ भी अपने बच्चों को चोंच और पंखों से सहला-सहलाकर उनमें उमंग भरती रहती हैं।
मतलब यह कि मालिश बड़े काम की चीज़ है। दुनिया के विभिन्न मानव समाजों में मालिश का इतिहास कोई नया नहीं है। अगर यूनान व रोम की महिलाएं अपना रूप यौवन क़ायम रखने के लिए मालिश का सहारा लेती थीं, तो मेडागास्कर-अफ्रीका की जंगली जातियों तक में शरीर में ख़्ा़ून बढ़ाने के लिए हज़ार साल पहले भी मालिश का प्रचलन था। अफ्रीका में विवाह से पूर्व वर-वधू दोनों की नित्य मालिश की प्रथा रही है। हिंदुस्तान में तो यह परंपरा कहीं ‘हल्दी’ और कहीं ‘पीठी’ जैसे नामों से आज तक बनी ही हुई है। इटली, ईरान, तुर्की व अरब देशों की यात्रा करने वालों को मालूम ही होगा कि वहाँ के हमामख़्ाानों में आज भी मालिश को कितनी अहमियत दी जाती है। पश्चिमी देशों में तो ख़्ौर मसाज सेण्टरों की भरमार ही होने लगी है। फ्रांस मालिश विद्या को प्रचारित करने में एक तरह से अग्रणी भूमिका निभा रहा है। वहाँ इसे बाक़ायदा चिकित्सा व्यवसाय और कला की दृष्टि से अपनाया जा रहा है।
हमारे लिए गर्व की बात यह है कि मालिश के चिकित्सकीय लाभों का ज्ञान दुनिया ने प्राचीन भारत से ही प्राप्त किया। हमारे आयुर्वेदिक गं्रथों में मालिश की जितनी वैज्ञानिक जानकारी और विधियाँ वर्णित हैं, वह अपने आपमें आश्चर्यजनक ही है। यूँ मालिश की विधियाँ कई तरह की हैं, पर यहाँ हम सौन्दर्य की दृष्टि से सिर्फ तेल मालिश की चर्चा करेंगे। चरक संहिता के पाँचवें अध्याय के निम्न श्लोक तेल मालिश की महत्ता अच्छी तरह व्यक्त करते हैं-
न चाभिघाताभिहतं गात्रमभ्यंग सेविन:।
विकारं भजते•त्यर्थं बलकर्मणि वा क्वचित्।।
अर्थात्-
नियमित तेल अभ्यंग (मालिश) से शरीर आघात सहने या बल प्रयुक्त होने वाले कार्यों को संपन्न करने में समर्थ होता है तथा मालिश से त्वचा विकार रहित रहती है । यानि कि मालिश से शक्ति और सामथ्र्य में वृद्धि होती है।
सुस्पर्शो पचितांगश्च बलवान प्रियदर्शिन:।
भवत्यभ्यंग नित्यत्वान्नरो•ल्प जर एव च।।
‘तेल मर्दन से त्वचा चिकनी, स्पर्श में कोमल, बलवान और सुंदर हो जाती है। साथ ही शरीर भी बलवान और प्रियदश्र्ाी होता है तथा बुढ़ापे के लक्षण कम दिखाई देते हैं।’
संवाहनश्रम हरं वृष्यं निद्रासुखप्रदम्।
मांसासृक्त्वक् प्रसन्नत्वकुर्याद्वात कफापहम् ।।
इसका अर्थ यह है कि ‘शरीर की मालिश श्रमनाशक धातुओं को पुष्ट करने वाली, अच्छी नींद लाने वाली, मांस, त्वचा व रक्त को निर्मल करने वाली तथा वात, कफ का शमन करने वाली होती है।
इतनी चर्चा के बाद उम्मीद है कि आप की समझ में अच्छी तरह आ गया होगा कि स्वास्थ्य और सौन्दर्य बनाए रखने के लिए तेल मालिश कितना ज़रूरी है। संक्षेप में तेल मालिश का मुख्य लाभ यह है कि त्वचा कांतिमान, झुर्रीरहित, निरोग और मज़बूत रहती है। रक्त संचार ठीक रहता है। शरीर में चुस्ती-फुर्ती बनी रहती है। विभिन्न अंगों को बल मिलता है। शरीर का लचीलापन क़ायम रहता है तथा बुढ़ापा देर से आता है। यह भी विशेष बात है कि तेल मालिश से दुबले लोगों का शरीर मांसल और पुष्ट होता है तथा मोटे लोगों का मोटापा घटता है। इसके अलावा मालिश से शरीर दर्द, सिरदर्द, हाथ-पैरों का कंपन, वात-व्याधि, जोड़ों का दर्द, अनिद्रा आदि में भी आराम मिलता है। इतना जानने के बाद, आजकल के कुछ अंग्रेजीदां लोग और एलोपैथी के डॉक्टर अगर तेल मालिश को फ़िजूल की चीज़ ठहराएं तो उनकी बातों पर ख़्ाास ध्यान न देते हुए आप शौक़ से इसे अपनी दिनचर्या में शामिल कीजिए और अपने पोर-पोर में शक्ति, कांति और स्फूर्ति का एहसास करिए।
तेल मालिश के लिए ज़रूरी बातें
1. यूँ तेल मालिश आप पूरे साल कर सकते हैं फिर भी बसंत और जाड़े का 3-4 माह का समय इसके लिए विशेष लाभकारी है।
2. उगते सूरज की लालिमा में प्रात:काल तेल मालिश करना सबसे अच्छा है। वैसे दिन में कभी भी खाली पेट तेल मालिश कर सकते हैं।
3. तेल मालिश के समय शरीर पर कम से कम कपड़े रहने चाहिए; जैसे कि निक्कर, जांघिया, लंगोट आदि।
4. सामान्यत: मालिश खुले हवादार स्थान पर करनी चाहिए। शरीर निर्बल हो और तेज़ असह्य हवा चल रही हो तो बंद कमरे में भी मालिश कर सकते हैं।
5. घर में यदि पति-पत्नी दोनों मौजूद हों तो परस्पर एक-दूसरे की मालिश कर सकते हैं। यह सुविधाजनक रहेगा, अन्यथा अपने शरीर की ख़्ाुद मालिश करें।
6. ज़मीन पर चटाई आदि बिछाकर बैठकर मालिश करें। जिस अंग की मालिश करें ध्यान उसी अंग पर एकाग्र रखें और मन में उमंग के भाव बनाएं।
7. तेल मालिश नीचे के अंगों से शुरू करके ऊपर की ओर करनी चाहिए। अर्थात् पाँव के तलुओं से मालिश की शुरूआत करके क्रमश: पंजे, पिंडलियों, घुटनों, जाँघ, नितंब, कमर, पेट, सीना, पीठ, गर्दन, चेहरा और सिर तक पहुँचें। इसे यूँ कहें कि पहले दोनों पैरों की बारी-बारी से मालिश करने के बाद, कमर, पेट व सीना, फिर दोनों हाथ, गर्दन और चेहरे व सिर की मालिश करें।
8. मालिश की दिशा हृदय की ओर होनी चाहिए। हाथ-पैर की मालिश पंजों से शुरू करें और कंधों व नितंब तक बढ़ें। पेट-कमर पर भी नीचे से ऊपर की ओर हृदय की दिशा में मालिश करें। पेट और सीने की मालिश गोलाकार हाथ घुमाते हुए भी करें। पीठ की मालिश रीढ़ स्थान से शुरू करके किंचित ऊपर दिशा में बाहर की ओर करें। गर्दन की मालिश अंदर से बाहर की ओर तथा चेहरे की मालिश गालों से कनपटी की ओर करें। सामान्य समझ इतनी रखें कि हृदय से निकली धमनियों की गति की विपरीत दिशा में मालिश विशेष लाभप्रद है।
9. अनावश्यक दबाव देने के बजाय हल्का दबाव देते हुए आहिस्ता-आहिस्ता मालिश करनी चाहिए। कम-से-कम 15-20 मिनट और ज़्यादा-से-ज़्यादा 45 मिनट तक मालिश करें।
10. बच्चों की मालिश प्रात:कालीन सूर्य की रोशनी जहाँ पड़ती हो वहाँ करनी चाहिए। इससे उनके शरीर को विटामिन ‘डी’ आसानी से प्राप्त हो सकेगी। बच्चों की मालिश के लिए नारियल, सरसों, जैतून के तेल उत्तरोत्तर बेहतर हैं। गाय के घी या मक्खन से मालिश करें तो अति उत्तम।
11. स्त्रियों की तेल मालिश के लिए ध्यान देने वाली विशेष बात यह है कि उन्हें अपने वक्षस्थल की मालिश में सावधानी बरतनी चाहिए। स्तनों पर सावधानी पूर्वक चारों ओर से हल्के हाथों स्तन के अग्रभाग की ओर मालिश करें। मासिक स्राव या गर्भकाल की स्थिति हो तो पेट एवं गर्भाशय के हिस्से को छोड़कर शेष शरीर की मालिश करनी चाहिए।
मालिश के लिए उपयोगी तेल
स्थानीय वातावरण और शरीर की प्रकृति को देखते हुए अपने अनुकूल तेल का चुनाव करना विशेष लाभप्रद रहता है। सामान्यत: सर्दी के मौसम में सरसों का तेल, बरसात के दिनों में तिल का तेल तथा गर्मी में नारियल तेल की मालिश विशेष हितकर है। शारीरिक प्रकृति के हिसाब से तेल का चयन करना हो तो कफ प्रकृति वालों को सरसों का तेल, वात प्रकृति वालों को तिल का तेल तथा पित्त प्रकृति वालों को नारियल का तेल चुनना चाहिए।
इन कुछ मुख्य तेलों के अलावा जैतून का तेल किसी भी मौसम में उपयोग में लिया जा सकता है। जैतून के तेल की मालिश से त्वचा की रंगत सुधरती है और उसमें मुलायमियत आती है। यह तेल स्त्रियों के वक्ष को विकसित करने की दृष्टि से भी विशेष लाभदायक है। बादाम का तेल भी काफ़़ी फ़ायदेमंद है। यह पलकों और भौंहों को घना बनाता है। विभिन्न व्याधियों में नीम का तेल, महुए का तेल, अरण्डी का तेल, चंदन का तेल, चमेली का तेल आदि भी उपयोग में लाए जाते हैं। आवश्यकतानुसार इन तेलों में औषधियों का मिश्रण करके या दो-तीन तेलों को आपस में मिलाकर मालिश किया जाता है। जैसे कि नारियल, अरण्डी और तिल का तेल समान भाग में मिलाकर सिर में मालिश करने से बालों की कई समस्याएँ दूर होती हैं। पुराना चूना तिल के तेल में मिलाकर लगाने से दाद के कष्ट में राहत मिलती है। पायेरिया रोग या दाँतों के तमाम कष्टों में सरसों के तेल में चुटकी भर हल्दी और बारीक नमक मिलाकर दाँतों व मसूढ़ों की मालिश करने से काफ़ी लाभ मिलता है। शरीर में ताज़गी लाने और त्वचा की रुक्षता दूर करने के लिए स्नान से आधा घण्टा पहले सरसों के तेल में समान भाग दही मिलाकर मालिश करनी चाहिए।
मुहासे निकलते हों तो सोते समय नारियल तेल में नींबू का रस बराबर मात्रा में मिलाकर चेहरे की मालिश करना हितकर रहता है। धूप में त्वचा झुलस जाए तो नारियल के तेल में थोड़ा नमक मिलाकर मालिश करें और 15-20 मिनट बाद धोएं। 5 तोला नारियल तेल में 2 तोला नमक तथा 2 तोला नींबू का रस मिलाकर मालिश करने से सारे शरीर की त्वचा की कोमलता और सुंदरता बढ़ती है।
इसी तरह अरण्डी के तेल में थोड़ा सा नमक और कपूर मिलाकर दिन में दो बार मसूढ़ों की मालिश करनी चाहिए। अरण्डी के तेल में बराबर मात्रा में शहद मिलाकर चेहरे पर मालिश करने से त्वचा कोमल बनती है और झुर्रियाँ मिटती हैं। चेहरे की त्वचा का सूखापन जैतून के तेल में मलाई मिलाकर मालिश करने से ठीक हो जाता है। धूप में झुलसकर त्वचा साँवली पड़ गई हो तो जैतून के तेल में बराबर मात्रा में सिरका मिलाकर मालिश करें। मुहासों में जैतून के तेल में समान भाग नींबू का रस मिलाकर मालिश करने से लाभ मिलता है। होंठों का कालापन कम करने के लिए बादाम के तेल में नींबू का रस मिलाकर नियमित मालिश करनी चाहिए। खाज, खुजली में चंदन के तेल में नींबू का रस बराबर मात्रा में मिलाकर मालिश करना हितकर है। कोढ़ की बीमारी में नीम के तेल में चालमोगरा का तेल मिलाकर मालिश करने से विशेष लाभ मिलता है। पित्ती की तकलीफ़ में नीम के तेल में समान भाग सरसों का तेल मिलाकर मालिश करने से आराम मिलता है। इस तरह से विभिन्न स्थितियों में विभिन्न औषधि द्रव्यों व तेलों के मिश्रण से मालिश करके लाभ उठाया जा सकता है।
तेल मालिश से कब बचें
तेल मालिश के इतने ढेर सारे लाभों के बावजूद कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी हैं जबकि इससे बचने की भी ज़रूरत पड़ सकती है। सामान्यत: ऐसी परिस्थितियाँ कम ही होती हैं ,फिर भी इन्हें जान लेना चाहिए और कुछ ख़ास तरह के रोगियों को तेल मालिश नहीं करनी चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार रक्तस्राव की स्थिति, बुख़्ाार, विरेचन के बाद, वमन के बाद, विषग्रस्तता, मूच्र्छा की उग्रावस्था, उग्र सूजन, दाह-जलन, अत्यन्त कमज़ोरी तथा पेट के कुछ गंभीर रोगों की अवस्था में तेल मालिश नहीं करनी चाहिए। शेष अनुकूल परिस्थितियों में नियमित तेल मालिश करिए और ताउम्र ताज़गी के अहसास से सराबोर रहिए।
सौन्दर्यरक्षक आभ्यंतर प्रयोग
सौन्दर्यरक्षक पाक
जो स्त्रियाँ किसी बीमारी के बाद कमजो़री की शिकार हो गई हों और सौन्दर्य नष्ट हो गया हो, उन्हें यह पाक निम्न अनुसार बनाकर सेवन करने से लाभ मिल जाता है-
सोंठ-डेढ़ तोला, काला जीरा-1 तोला, विधारा-डेढ़ तोला, चव्य- 1 तोला, अकरकरा- डेढ़ तोला, तेज़पात-1 तोला, धनिया-डेढ़ तोला, सफे़द जीरा-डेढ़ तोला, बरियारी की जड़-2 तोला, इलायची-2 तोला, चित्रक-2 तोला, पीपल-1 तोला, जावित्री-1 तोला, त्रिफला-2 तोला, नागकेसर-डेढ़ तोला, गोदुग्ध 5-सेर, चीनी-ढाई सेर तथा गाय का घी तीन-पाव।
निर्माणविधि- पहले दूध को इतना पकाइए कि आधा रह जाए। इसके बाद इसमें सोंठ पीसकर मिला दें। मावा बन जाने पर सभी औषधियों को कपड़छन चूर्ण करके इसमें मिला दें तथा एक पाव घी में सेंकें, बाद में शेष घी मिला दें। औषधियाँ अच्छी तरह एकसार हो जाएं तो चीनी की चाशनी बनाकर इसमें डालें तथा पिश्ता, बादाम, नारियल, चिरौंजी आदि मेवे मिलाकर जमा दें।
इसे 1 तोला से लेकर 5 तोला तक पाचनशक्ति के अनुसार सबेरे-शाम दूध से सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से चुस्ती-फुर्ती, प्रसन्नता तथा पूरे शरीर में सुंदरता का संचार होता है। यह योग भूख की कमी, क्षय, पांडु, कमरदर्द, नेत्रों की कमज़ोरी, प्रदर आदि अन्यान्य रोगों को भी ठीक करने में समर्थ है। इसे पुरुष भी सेवन कर सकते हैं।
**************************************
एक पाव दूध में असली केसर की चार-पाँच पंखुडियाँ तथा एक छोटी इलाइची डालकर उबालें तथा नियमित सर्दियों में दो-तीन माह पिएं। इससे त्वचा की रंगत निखरती है।
**************************************
आँवले का मुरब्बा 25 ग्राम नित्य तीन-चार माह खाने से वर्ण सुधरता है।
**************************************
गाजर व चुकन्दर का रस एक गिलास एक माह तक पीने से रक्त शुद्ध होता है तथा वर्ण निखरता है।
**************************************
अंगूर, किशमिश व मुनक्के के सेवन से रंग साफ़ होता है।
**************************************
टमाटर, मूली, गाजर, चुकन्दर, प्याज, पत्तागोभी आदि को सलाद के रूप में सेवन करने से त्वचा स्वस्थ बनती है।
**************************************
त्रिफला चूर्ण तीन ग्राम की मात्रा में गर्म पानी के साथ सोते समय सेवन करते रहने से पेट साफ़ रहता है और त्वचा रोगी नहीं होते।
**************************************
1 तोला मुनक्का साफ़ करके 5 तोला पानी में शाम को भिगो दें। सबेरे बीज अलग करके मुनक्का खा लें और बचे पानी में मिश्री मिलाकर या वैसे ही पी लें। एक माह में मुहाँसे निकलने कम हो जाएंगे।
**************************************
यदि आँखें अंदर धँस रही हों और उनके चारों ओर कालापन हो तो 5-6 बादाम की गिरियाँ रात भर पानी में भिगोकर सबेरे पीसकर एक पाव गर्म मिश्री युक्त दूध के साथ 21 दिनों तक पिएं। इस दौरान रोज़ सायंकाल देशी गुलाब का गुलकंद भी एक छोटी चम्मच भर सेवन करते रहें। इसके अलावा शहद और बादाम का तेल समान मात्रा में मिलाकर आँखों के चारों ओर हल्के-हल्के मालिश करें तथा आधे घण्टे बाद धो दें।
रतिबल्लभ पाक
आधा किलो-बबूल का गोंद, 100 ग्राम-सोंठ, 50-50 ग्राम-पीपलामूल एवं पीपल, 25-25 ग्राम-शुद्ध शिलाजीत, मोचरस, जायफल, जावित्री, लौंग, 10-10 ग्राम-दालचीनी, नागकेसर, तेज़पात, काली मिर्च, प्रवाल भस्म, इलायची, अभ्रक भस्म, लौहभस्म, बंगभस्म तथा 5 ग्राम-केसर, 250 ग्राम-घी, 2 किलो- शक्कर व जितना ज़रूरी समझें, मेवे ले लें।
गोंद को बारीक कूटकर कढ़ाई में घी गर्म करके तल लें। पीपल, पीपलामूल व सोंठ को कपड़छन चूर्ण करें। केसर व भस्मों को छोड़कर शेष लौंग आदि द्रव्यों को मिलाकर एक साथ कपड़छन चूर्ण बनाएं। खोपरा, किशमिश, बादाम आदि मेवे भी बारीक काटकर रखें। केसर को पत्थर के खरल में गुलाबजल के साथ घोंट लें। अब चारों भस्मों को भी साफ़ खरल में घुटाई करके एक में मिला लें।
यह सब तैयार हो जाने के बाद शक्कर की एक तार की चाशनी बनाएं तथा सबसे पहले तले गोंद, सोंठ, पीपल व पीपलामूल का चूर्ण इसमें मिलाएं तथा आँच धीमी रखें। अब इसमें भस्में डालकर कड़छी से चलाते जाएं। जब चाशनी जमने लायक़ बन जाए तो इसे उतार लें तथा किंचित गर्म रहने पर लौंग आदि द्रव्यों का चूर्ण डालकर अच्छी तरह मिलाएं। केसर भी इसमें मिला दें। अब किसी थाली आदि में घी चुपड़कर इसे जमा दें और कटे हुए मेवे ऊपर से बुरक दें। बाद में बर्फीनुमा काटकर काँच के बरतन में रख लें।
इस पाक को पाचनशक्ति के अनुसार 2 से 4 तोला तक सबेरे मीठे कुनकुने दूध के साथ चबा-चबाकर सेवन करना चाहिए।
यह योग स्त्रियों व परुषों दोनों के लिए ही अत्यन्त गुणकारी है। महिलाओं का प्रदर रोग, प्रसूति रोग व शरीर की दुर्बलता इससे दूर होती है। प्रसव के उपरांत आई कमज़ोरी को दूर करके यह स्त्री के शरीर को सबल बनाता है और उसके स्वास्थ्य व सौन्दर्य की वृद्धि करता है। विवाहित पुरुषों के लिए यह बल-वीर्यवर्धक, यौन शक्तिदायक व सौन्दर्यरक्षक है। शीतकाल में इस योग का सेवन करना चाहिए।
नागकेसर, कमल व कुमुद का चूर्ण शहद व घी में मिलाकर खाने से त्वचा की रंगत में निखार आता है। घी तथा इसकी आधी मात्रा में शहद सोयाचूर्ण में मिलाकर सेवन करते रहने से सौंदर्य में निखार लाता है।
स्वास्थ्य और सौन्दर्य का शत्रु मोटापा
मोटापे का अर्थ है- शरीर में चर्बी यानी वसा का ज़्यादा मात्रा में इकट्ठा हो जाना। चर्बी भी अजब चीज़ है। अगर संतुलन में हो तो शरीर को सुडौल बनाए रखती है, कम हो तो आदमी बेडौल दिखता है और ज़्यादा हो जाए तो बेडौल ही क्या पूरा शरीर डाँवाँडोल हो जाता है। अर्थात् एक सीमा तक चर्बी ज़रूरी है, इसके बाद गैरज़रूरी। जिनके शरीर में चर्बी संतुलित मात्रा में है, उनके लिए तो चिंता की कोई बात नहीं है पर जिनके शरीर में चर्बी की कमी है, वे चर्बी बढ़ाने के लिए और जिनके शरीर में चर्बी ज़्यादा है, वे इसे घटाने के लिए परेशान दिखते हैं। इस अध्याय में हम चर्बी बढ़ने अर्थात् मोटापे की समस्या से निजात पाने की ही चर्चा करेंगे।
मोटापे की समस्या के जैविक कारणों पर तमाम वैज्ञानिक विश्लेषण उपलब्ध हैं, पर यहाँ उनकी गंभीर चर्चा बहुत ज़रूरी नहीं दिखती क्योंकि यह पुस्तक जनसामान्य को ध्यान में रखकर लिखी जा रही है। अलबत्ता, मोटापे की समस्या के कुछ मोटे-मोटे पहलू जान लेना तो उपयोगी है ही।
दरअसल मोटापे की समस्या मुख्य रूप से दो तरह से पैदा होती है। कुछ लोगों में मोटापा वंशगत प्रभाव से आता है या शरीर की अन्दरूनी मशीनरी ऐसी होती है कि वे जो कुछ खाते हैं उसका ज़्यादा हिस्सा चर्बी में तब्दील हो जाता है। यानी एक वर्ग ऐसा है जिनके शरीर में चर्बी जमा करने की ख़्ाास प्रवृत्ति होती है। ऐसे लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति हमेशा चौकन्ना रहने की ज़रूरत होती है। मोटापे का दूसरा और सबसे व्यापक कारण है लापरवाही भरी दिनचर्या। ज़रूरत से ज़्यादा और सारे दिन कुछ न कुछ खाते रहने, आलस्य भरा और श्रमहीन जीवन बिताने, भोजन के बाद दिन में सोने, तली-भुनी, वसायुक्त चीजों़ का ज़्यादा सेवन करने जैसी आहार-विहार की लापरवाहियों की वजह से ज़्यादातर लोग मोटापे के शिकार बनते हैं। एक सवाल यह है कि आख़्िार किस स्थिति को हम मोटापा कहेंगे ? तो इसका सामान्य सा उत्तर यह है कि जब तक शरीर की चुस्ती-फुर्ती क़ायम है और मन में उत्साह-उमंग बना हुआ है, तब तक मोटापे या दुबलेपन जैसी कोई समस्या नहीं है। यूँ सामान्यत: जितने इंच शरीर की लंबाई हो लगभग उतने ही किलो शरीर का वज़न हो तो इसे संतुलित स्थिति मानी जाती है। इसमें उन्नीस-बीस के फ़कऱ् से कोई ख़्ाास अन्तर नहीं पड़ता। लेकिन जब फ़कऱ् ज़्यादा बढ़ने लगे तो समझिए कि सावधान होने का समय आ गया है। जिन बुज़ुर्गों का वज़न, 30-35 वर्ष की उनकी स्वस्थ अवस्था जितना आज भी बना हुआ है, वे अपने को अच्छी स्थिति में मान सकते हैं।
मोटापे का आक्रमण सबसे पहले अक्सर पेट, कमर, कूल्हों और जाँघों पर होता है। इसके बाद गर्दन, चेहरा, हाथ-पैर व शरीर के शेष अंग इसकी गिरफ़्त में आते हैं। ध्यान रखने वाली बात है कि शुरूआती दौर में, या जब तक मोटापा पेट, कमर, कूल्हों और जाँघों तक ही सीमित है तब तक इसे दूर करना ज़्यादा आसान है। लेकिन जब पूरे शरीर पर मोटापा अपना मज़बूत क़ब्ज़ा जमा लेता है तो इसे हटा पाना तकलीफ़देह और मशक्कत भरा काम हो जाता है।
खैर, स्थिति जो भी हो, अगर मोटापे से ग्रस्त लोग अपना स्वास्थ्य और सौन्दर्य वापस लाना चाहते हैं तो उन्हें अविलम्ब संकल्प की मज़बूती के साथ कमर कसकर कुछ उपायों पर अमल करने की तैयारी कर ही लेनी चाहिए, अन्यथा भविष्य की देहरी पर मधुमेह, हाई ब्लडपे्रशर, क़ब्ज़, गैस, हृदय रोग, दमा, गठिया आदि अन्यान्य रोग उनका स्वागत करने को तैयार मिलेंगे, यह तय जान लें।
वैसे मोटापे से त्रस्त लोग इससे निजात पाने के लिए जाने क्या-क्या करते हैं और कहाँ-कहाँ भटकते हैं, पर ज़्यादातर ऐसा ही होता है कि मोटापा अन्तिम दम तक साथ नहीं छोड़ता। यह भी गौ़रतलब है कि मोटापे के इलाज के चक्कर में अक्सर लोग ज़्यादा ख़्ातरनाक बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। ऐसे में सीधी सी बात यह है कि मोटापा दूर करने का कार्यक्रम बहुत सोच-समझकर बनाएं और मुस्तैदी से उसका पालन करें। दवाओं का सहारा लेने का इरादा हो तो इतना याद रखें कि एलोपैथी में मोटापा घटाने की अब तक जो भी दवाएं हैं, वे निरापद क़तई नहीं हैं। इन दवाओं से आप ज़्यादा बड़ी मुसीबत में फँस सकते हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा से अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। आयुर्वेद के तमाम नुस्खों निरापद और कारगर हो सकते हैं, पर इनमें भी हर किसी नुस्खों को सिर्फ जड़ी-बूटियों के नाम पर ही आँख मूंदकर नहीं आज़माया जा सकता। पथ्य-अपथ्य का ध्यान रखते हुए होम्योपैथी और बायोकैमी दवाओं से वज़न घटाना पूरी तरह सुरक्षित माना जा सकता है। कई लोग सोच सकते हैं कि स्वदेशी चिकित्सा की बात करते-करते होम्योपैथी का ज़िक्र कैसे ? तो यहाँ अति संक्षेप में यह बता देना उचित है कि होम्योपैथी के सिद्धांत और आयुर्वेद की मूल मान्यताओं में कहीं कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि कई मायनों में होम्योपैथी कहीं ज़्यादा ‘आयुर्वेदिक पद्धति’ है। यह रहस्य वे लोग आसानी से समझ सकते हैं जिन्हें होम्योपैथी के सैद्धांतिक पक्ष की गहरी समझ है। यह भी आश्चर्यजनक बात है कि जर्मनी में खोजी गई यह पद्धति भारतीय समाज और सांस्कृतिक मूल्यों के सर्वथा अनुकूल है। ऐसी पद्धति की खोज संभवत: इसलिए भी आसान हुई,क्योंकि इसके आविष्कर्ता महात्मा हनीमेन का जीवन भारतीय ऋषियों-महात्माओं जैसा अध्यात्म प्रेरित नैतिकतावादी रहा।
बहरहाल, मोटापा घटाने के लिए आप कुछ भी करें, अंतत: आहार-विहार संयमित करने से ही बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। इसमें से पहले आहार की बात की जाए तो इसका सीधा सा अर्थ यह है कि आपको अपना खान-पान ऐसा संयोजित करना होगा कि शरीर को बाहर से वसा और ऊर्जामान (कैलोरी) की आपूर्ति कम से कम हो। चूँकि वसा शरीर के लिए ऊर्जा का स्रोत है, इसलिए बाहर से कम वसा और कम कैलोरी पहुँचेगी तो शरीर में ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करने के लिए अन्दर जमा चर्बी अपघटित होकर शरीर के काम आने लगेगी और इस तरह मोटापा कम होना शुरू हो जाएगा। कैलोरी कम करने के चक्कर में अक्सर लोग भोजन एकदम कम कर देते हैं। आजकल प्रचलित ‘डायटिंग’ का यह तरीक़ा काफ़ी नुकसानदेह हो सकता है और इससे आप शक्तिहीनता और कई दूसरी बीमारियों के शिकार हो सकते हैं।
दरअसल आहार को कम करने के बजाय उसे संतुलित करने की ज़रूरत है। भोजन में ऐसी चीजें़ शामिल करनी चाहिए जो कम वसायुक्त हों और जिनका ऊर्जामान (कैलोरी) कम हो, परंतु वे शरीर के लिए ज़रूरी पोषकता की पूर्ति करने वाली हों।
आहार संतुलन के बाद विहार में भी संतुलन ज़रूरी है। अर्थात् पूरे दिन में से कुछ समय आपको शारीरिक श्रम के लिए अवश्य ही निकालना चाहिए। जितनी ऊर्जा शरीर को भोजन से मिलती है अगर उससे ज़्यादा श्रम में ख़्ार्च होती है तो समझिए कि मोटे लोगों के लिए सार्थक परिणाम निकल सकते हैं।
आहार-विहार को संतुलित करते हुए मोटापा घटाने का फिलहाल एक कार्यक्रम दिया जा रहा है, मोटे लोग इसे अपनाएं और लाभ उठाएं-
1. 6-7 घण्टे की पर्याप्त नींद लेने के बाद सबेरे जल्दी उठने की आदत बनाएं। उठने के बाद सबसे पहले 1 गिलास गुनगुने गरम पानी में 2 चम्मच नींबू का रस और दो चम्मच शुद्ध शहद मिलाकर गटागट पी जाएं। अब कुछ देर टहलने के बाद शौच के लिए जाएं।
2. शौचादि से निवृत्त होकर कम से कम 3-4 किलोमीटर तेज़ क़दमों से टहलने निकलें, हो सके तो थोड़ी दौड़ भी लगाएं। याद रखें धीरे-धीरे चहलक़दमी करने से मोटापे पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। टहलने के बाद समय हो तो कुछ योगासन व्यायाम करें। टहलने के बजाय चाहें तो केवल आसन व्यायाम से भी काम चला सकते हैं। आसनों में सूर्यनमस्कार, उत्तान पादासन, हलासन, धनुरासन, जानुशिरासन, वक्रासन, ताड़ासन, पश्चिमोत्तान आसन, भुजंगासन, पवनमुक्तासन में से पहले आसान आसनों से शुरूआत करके धीरे-धीरे जितने आसन कर सकें, करें। उड्डियान बंध तथा भस्त्रिका प्राणायाम भी करें। आसन-व्यायाम फ़़ुरसत हो तो सबेरे शाम दोनों समय खाली पेट कर सकते हैं; और बेहतर परिणाम मिलेगा। इतना अवश्य समझ लें कि आसन-व्यायाम योग्य व्यक्ति से सीख-समझकर ही शुरू करना चाहिए।
3. नाश्ता हल्का-फुल्का करें। कोई एक क़िस्म का एक पाव फल या फल का रस लें। 50 ग्राम मँूग में थोड़ा गेहूँ, थोड़ी मेथी मिलाकर अंकुरित करके सेंधा नमक और नींबू का रस मिलाकर भी नाश्ते के रूप में सेवन कर सकते हैं। दूध पीते हों तो मलाई उतारकर एक पाव दूध में आधा चम्मच सोंठ तथा 6-7 मुनक्का या थोड़ा अंजीर डालकर उबालें और गुनगुना रहने पर पिएं। चाय पीने का इरादा हो तो अदरक या सोंठ, तुलसी, काली मिर्च, लौंग, इलायची, मुलहठी आदि जड़ी-बूटियों की चाय इस्तेमाल कर सकते हैं। इस तरह की आयुर्वेदिक चाय गुरुकुल कांगड़ी, दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट (स्वामी रामदेव), गायत्री परिवार, संत आसाराम बापू आश्रम आदि की बनी हुई मिलती है।
4. मोटापे से ग्रस्त लोगों को दोपहर और शाम के भोजन में विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। तेल, घी से बनी वसायुक्त और ज़्यादा प्रोटीन व कार्बोज युक्त चीज़ों का सेवन हर हाल में सीमित कर देना चाहिए। भोजन से पहले पर्याप्त मात्रा में सलाद खाएं। हरी सब्जियों की मात्रा भरपूर रखें और गेहूँ की रोटी कम खाएं। अगर मोटापे की समस्या ज़्यादा हो
तो कम से कम एक माह के लिए गेहूँ की रोटी खाना एकदम बंद कर दें। इस दौरान जौ के आटे से बनी रोटी भोजन में लें या साबुत चने में जौ मिलाकर पिसवा लें। इस आटे की रोटी स्वादिष्ट भी लगेगी। 10 किलो चना हो तो दो किलो जौ मिलाएं तो अच्छा लाभ मिलेगा। दालों में छिलकायुक्त मूँग, मसूर का सेवन बेहतर रहेगा।
चिकित्सा के शुरू में यदि एकाध हफ्ते तक सिर्फ मौसमी फल, फलों के रस, सलाद और हरी सब्जियों व दाल पर ही निर्वाह करें तो अच्छा है। इसके बाद धीरे-धीरे जौ की रोटी सेवन करना शुरू करें। एक डेढ़ माह बाद गेहूँ की रोटी खाना शुरू कर सकते हैं। दोनों समय का भोजन इसी तरह का करें। शाम को सोने से दो-तीन घण्टे पूर्व भोजन कर लेना हितकर है। क़िब्ज़यत दूर करने के लिए एनिमा ले सकते हैं या सोने से पूर्व एक गिलास गुनगुने पानी के साथ एक चम्मच त्रिफला में दो चम्मच ईसबगोल मिलाकर सेवन करें। त्रिफला के स्थान पर आँवले का चूर्ण भी ले सकते हैं। वैसे भी भोजन आदि के साथ ताज़ा या सूखे आँवले का चूर्ण, जो भी मिले, अवश्य सेवन करें।
दोपहर के भोजन के साथ मलाई रहित दूध से जमाई दही या छाछ भी ले सकते हैं। इससे मोटापा घटाने में मदद मिलेगी। भोजन में यह पूरा सुधार अपनाते हुए इतना याद रखें कि शुरू में एक हफ्ते तक फल-सब्जियों पर निर्वाह करने के बाद अचानक ही ढेर सारी रोटियाँ न खाना शुरू कर दें। एक-दो रोटी से शुरू करके धीरे-धीरे रोटियों की संख्या यथोचित मात्रा तक बढ़ाएं।
मोटापा, खासतौर से पेट और कमर का, घटाने के लिए एक अच्छा प्रयोग यह है कि दोनों समय भोजन करने के तुंरत बाद आधा गिलास उबला हुआ गर्म पानी चाय की तरह जितना गर्म पी सकें पी जाएं। यह प्रयोग डेढ़-दो माह तक कर सकते हैं। इसे बहुत लंबे समय तक नहीं चलाना चाहिए। यह प्रयोग प्रसव के बाद महिलाओं के पेट बढ़ने की समस्या में विशेष लाभप्रद है। गठिया, क़ब्ज़, गैस, यकृत रोग, मासिक धर्म की अनियमितता, आँखों के नीचे के कालेपन आदि में भी गर्म पानी का प्रयोग काफ़ी हितकर है।
5. दोपहर और शाम के भोजन में 8-9 घण्टे का अंतराल हो तो बीच में 3 या 4 बजे तक कोई हल्का पेय या फल लें। थोड़े भुने चनों के साथ आयुर्वेदिक चाय लेकर भी काम चला सकते हैं।
इतने उपायों पर अमल करते हुए आप कुछ दिनों में मोटापे की समस्या पर तो विजय पा ही जाएंगे, आपके पोर-पोर में स्फूर्ति का भी संचार होगा। इन उपायों के साथ चाहें तो बायोकैमी की कल्केरिया फास 3ग् या 6ग्, काली फास 3ग्, काली म्यूर 6ग्, नेट्रम म्यूर 3ग् तथा साइलीशिया 12ग् नामक दवाओं की एक-एक टिकिया मिलाकर एक घूँट गरम पानी के साथ दिन में तीन-चार बार जब तक मोटापा न कम हो जाए तब तक सेवन कर सकते हैं। याद रखें कि बायोकैमिक दवा की टिकिया निगलने के बजाय जीभ पर रखकर चूसनी होती है। यह उपाय सोने पर सुहागा का काम करेगा। इसके अलावा चरित्रगत विशेषताओं के आधार पर चुनी गई कई होम्योपैथी औषधियाँ भी मोटापा घटाने में अच्छा प्रभाव दिखा सकती हैं।
ममोटापा घटाने में सहायक कुछ अन्य नुस्खे
1 गिलास पानी में 4 बड़े चम्मच भर सिरका खाली पेट सेवन करते रहने से कमर का मोटापा दूर होता है।
**************************************
कुलथों को पकाकर खाने से शरीर की चर्बी छँटती है।
**************************************
सायंकाल के समय 6 माशा त्रिफला कोरे मिट्टी के पात्रा में लगभग छटाँक भर जल में भिगो दें। प्रात: मसल-छानकर तथा एक तोला शहद मिलाकर नियमित पिएं।
**************************************
पेट, कमर व कूल्हों की चर्बी कम करने के लिए भाप सेंक करना चाहिए। यदि प्राकृतिक चिकित्सालय आदि में व्यवस्था न हो तो यह उपाय आप घर में भी कर सकते हैं। इसके लिए एक बड़े भगोने या पतीली में एक चम्मच नमक तथा तीन-चार चम्मच अजवायन डालकर पानी भर दें। बरतन पर जाली या चलनी आदि रखकर पानी को उबालें। जब भाप उठने लगे तो दो छोटे तौलिए ठण्डे पानी में भिगोकर निचोड़ लें तथा बारी-बारी से जाली पर रखकर भाप से गर्म करके पेट, कमर तथा कूल्हों की सेंक करें। इस उपाय से धीेरे-धीरे चर्बी छँटने लगेगी।
**************************************
प्रात: शौच जाने से पूर्व एक गिलास ठण्डे पानी में दो चम्मच शहद मिलाकर नियमित कुछ दिनों तक पीने से चर्बी कम होने लगती है।
**************************************
तुलसी के पत्तों के रस में शहद मिलाकर नियमित चाटते रहने से चर्बी कम होती है।
**************************************
1 तोला मूली चूर्ण इतने ही शहद में मिलाकर पानी के साथ सेवन करने से चर्बी छँटती है।
**************************************
बड़ी हरड़, आँवला तथा बहेड़े का छिलका (त्रिफला) समान भाग लेकर चूर्ण बनाकर इसमें से 1 तोला चूर्ण शहद मिले पानी के साथ सेवन करने से 40 दिनों में मोटापा कम होने लगता है।
**************************************
त्रिफला व गिलोय के काढ़े में 250 मि.ग्रा. लौह भस्म मिलाकर पीने से मोटापा बढ़ना रुक जाता है।
**************************************
12 ग्राम शहद में 3 ग्राम चित्रकमूल का चूर्ण मिलाकर चाटने से पेट बढ़ना रुक जाता है।
**************************************
1 तोला गिलोय, 3 तोला बायबिडंग, 2 तोला छोटी इलायची, 4 तोला इन्द्रजौ, ढाई तोला बहेड़ा, 5 तोला बड़ी हरड़, 7 तोला आँवला तथा 8 तोला शुद्ध गुग्गुल लें। गुग्गुल के अलावा पहले शेष सभी चीज़ों का चूर्ण बनाएं, इसके बाद गुग्गुल में मिलाकर अच्छी तरह कूटकर रख लें। आधा से 1 तोला यह चूर्ण शहद में मिलाकर सबेरे शाम पानी के साथ सेवन करने से मोटापा कम होने लगता है। इसके साथ पथ्य - अपथ्य का विशेष ध्यान रखें तो जल्दी सफलता मिलती है।
दुबलापन भगाइए सौन्दर्य बचाइए
मोटापे की तरह दुबलापन भी एक समस्या है। हालाँकि दुबलेपन की समस्या उतनी बड़ी नहीं है जितनी कि मोटापे की। मोटे लोगों की तुलना में दुबले लोग प्राय: कम ही बीमार पड़ते हैं और उनके ज़्यादा दिनों तक ज़िन्दा रहने की भी संभावना रहती है। फिर भी, अगर देह हड्डियों का कंकाल सा नज़र आए तो समझिए कि कुछ मांसलता लाने की ज़रूरत है। ठीक अनुपात में मांसल शरीर स्वास्थ्य व सौन्दर्य की दृष्टि से उचित है।
आहार-विहार में उचित सुधार करके देह का दुबलापन दूर किया जा सकता है। कुछ लोग वंशगत प्रभाव से दुबले-पतले होते हैं। उनके शरीर की आंतरिक संरचना कुछ ऐसी होती है कि वे कितना भी पौष्टिक खाएं-पिएं पर शरीर में चर्बी इकट्ठा ही नहीं हो पाती और चाहकर भी वे मांसल नहीं दिखते। ऐसे लोगों का दुबलापन दूर होना थोड़ा मुश्किल तो है पर असंभव नहीं है।
दुबलापन दूर करने का कार्यक्रम बनाने से पहले यह देख लेना चाहिए कि कहीं किसी रोग की वजह से तो ऐसा नहीं है। यदि कोई रोग हो तो पहले उसे ठीक करने का उपाय करें। ज़्यादा संभव है कि आरोग्य होते ही दुबलापन भी खुद बखुद दूर हो जाएगा। यदि बीमारी ठीक होने के बाद भी दुबलापन बना रहे तो इस अध्याय में दिए उपायों को आज़माकर लाभ उठाएं। बिना किसी ख़्ाास बीमारी के होते हुए भी दुबलापन है तो इसके पीछे-कम भोजन करना या भूखे रहना, पौष्टिकता रहित भोजन करना, रात में देर तक जागना, कम विश्राम करना या क्षमता से ज्यादा श्रम करना, ज़्यादा उपवास करना, तनाव-चिंता-शोक में जीवन बिताना, पाचनशक्ति कमज़ोर होना आदि कारण हो सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि उक्त कारण ज़िम्मेदार हों तो दुबलापन दूर करने की कोशिश करने के साथ-साथ इन गड़बड़ियों को भी दूर करना चाहिए और ईष्र्या, द्वेष, चिंता, शोक, क्रोध से मुक्त होकर प्रसन्नचित्त, उमंग भरा जीवन बिताते हुए निम्न उपाय करने चाहिए-
1- दुबलापन दूर करने की पहली शर्त यह है कि आप अपनी पाचनशक्ति मज़बूत करें ताकि खाया-पिया शरीर में अच्छी तरह जज़्ब हो और खुलकर भूख लगे। इसके लिए हफ्ते भर विधिपूर्वक उपवास कर सकते हैं। तरीक़ा यह है कि जब उपवास करना हो तो एक दिन पहले मूँग की खिचड़ी आदि हल्का भोजन लें। रात में दूध या पानी के साथ 2 चम्मच ईसबगोल, एरण्ड तेल अथवा त्रिफला सेवन करके उदर की सफ़ाई करें। दूसरे दिन रोटी बंद कर दें और मौसमी फलों व उबली हरी साग-सिब्ज़यों पर निर्वाह करें। तीसरे दिन 2-3 घण्टे के अंतराल पर थोड़ा-थोड़ा करके सिर्फ फलों का रस पिएं। चौथे दिन सिर्फ पानी पीकर रहें। साथ में नींबू और शहद ले सकते हैं। पाँचवें दिन पुन: फलों का रस लें। छठे दिन फल व उबली साग-सब्ज़ी पर रहें। सातवें दिन एक-दो चपाती से शुरू करके धीरे-धीरे खुराक बढ़ाएं। इस उपवास काल में दो-तीन दिन एनिमा द्वारा पेट की सफ़ाई कर लें तो बेहतर परिणाम मिलेगा।
उपवास करने के बाद प्राय: भूख खूब लगने लगती है और खुराक बढ़ जाती है। इस तरह से बढ़ी हुई खुराक दुबलापन दूर करने में अत्यन्त सहायक है।
2- दुबले लोग सबेरे पौष्टिक नाश्ता लें, पर इसका समय भोजन से 3-4 घण्टा पहले और सोकर उठने के 2-3 घण्टे बाद रखें। एक पौष्टिक नाश्ता यह है कि थोड़े चनों में गेहूँ, मूँगफली, मूँग मिलाकर अंकुरित कर लें। इस अंकुरित अन्न में नींबू और थोड़ा नमक निचोड़कर नाश्ते के रूप में सेवन कर सकते हैं। नमक, नींबू न मिलाना चाहें तो इसे गुड़ के साथ या इसमें थोड़ी भिगोई किशमिश व खजूर मिलाकर भी सेवन कर सकते हैं। ऊपर से चाहें तो थोड़ा दूध पिएं। नमक, नींबू मिलाएं तो दूध न पिएं।
इसके अलावा आगे वर्णित खजूर और दूध वाला नाश्ता भी कर सकते हैं या अनुकूल पड़े तो केला-दूध लें। जाड़े के दिनों में उड़द का आटा, बबूल का गोंद, देशी घी, अश्वगंधा तथा मेवे मिलाकर बनाया गया लड्डू भी पाचनशक्ति के अनुसार सेवन कर सकते हैं। पौष्टिक नाश्ते और भी कई हैं, उन्हें सोच-समझकर सेवन करके लाभ उठाया जा सकता है।
3- दोपहर और शाम के भोजन में पर्याप्त पौष्टिक पदार्थों का सेवन खूब चबा-चबाकर करें। उपलब्धता के हिसाब से गाजर, पालक, चौलाई, टिण्डा, परवल व विभिन्न हरी सब्जियां, मौसमी फल, घी का तड़का लगी दाल, आँवले का मुरब्बा, दूध, घी, मक्खन, चावल की खीर आदि सेवन करें। रोटियाँ गेहूँ की खाएं। चाहें तो गेहूँ में तिहाई भाग चने मिलाकर पिसवा लें और इस आटे की रोटी खाएं। भोजन के बाद एक-दो केले और आगरे का पेठा या आँवले का मुरब्बा लें तो अच्छा है। रात के भोजन में एकाध रोटी कम खाएं। भोजन के बाद आगे वर्णित अश्वगंधारिष्ट वाला नुस्खा भी सेवन कर सकते हैं।
4- दोनों भोजनों के बीच 8 घण्टे का अंतर रखते हुए मध्यकाल में किसी मौसमी फल या जूस का हल्का पाचक पौष्टिक अल्पाहार ले सकते हैं।
5- पानी भोजन के डेढ़-दो घण्टे बाद पीने की आदत बनाएं। इसके अलावा दिन भर में डेढ़-दो घण्टे के अंतराल पर 6-8 गिलास तक खुब पानी पीते रहें।
6- रात में भोजन से दो-तीन घण्टे बाद और सोने से पूर्व गुनगुने दूध में एक चम्मच घी के साथ मिश्री या दो-तीन चम्मच शहद मिलाकर पिएं। चाहें तो दूध-खजूर वाला आगे लिखा प्रयोग भी कर सकते हैं। सिर्फ इतना ध्यान रखें कि रात में यह नुस्ख़्ाा सेवन करें तो इसमें खजूर की मात्रा सिर्फ आठ-दस ही रखें और सबेरे इसे न सेवन करें।
7- इतना उपाय करते हुए सबेरे अपने अनुकूल व्यायाम, योगासन, प्राणायाम अवश्य करें। इस संबंध में किसी पुस्तक या योग्य व्यक्ति से जानकारी प्राप्त की जा सकती है। याद रखें, पौष्टिक आहार के साथ बिना उचित मात्रा में श्रम, व्यायाम किए स्वस्थ सुडौल बनना नामुमकिन है।
उपर्युक्त सुझावों पर अमल करने के बाद दो-तीन माह में आप अपनी सेहत में क्रांतिकारी परिवर्तन देखेंगे। इन उपायों के साथ अपनी प्रकृति को देखते हुए औषधीय प्रयोग के तौर पर निम्न नुस्ख़्ाों से भी लाभ उठाया जा सकता है-
**************************************
1 भाग विशुद्ध कासीस भस्म को 16 भाग सुदर्शन चूर्ण के साथ तीन घण्टे तक सूखा मर्दन करके चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 2 ग्राम की मात्रा में प्रात: सायं जल के साथ सेवन करें। फिर भोजनोपरांत 2-2 ग्राम की 3 मात्रा 10-10 मिनट पर सितोपलादि चूर्ण फाँक लें। इसके बाद आधे घण्टे तक पानी न पिएं।
इस योग के सेवन से सातवें दिन से ही रक्तवृद्धि होने लगती है। इस कल्प के सेवन से शुक्र की कमज़ोरी, दुबलापन, आलस्य समाप्त होकर रोगी स्वस्थ, सबल और उत्साहपूर्ण हो जाता है। इस योग का प्रयोग जीर्ण-ज्वर, विषम-ज्वर के उपरांत होने वाली दुर्बलता में विशेष लाभप्रद है।
जनरल टॉनिक
अर्जुनारिष्ट, बलारिष्ट, अंगूरासव, अश्वगंधारिष्ट तथा दशमूलारिष्ट- प्रत्येक 500-500 मि.ली.; लौह भस्म, अभ्रक भस्म तथा शुद्ध शिलाजीत -10-10 ग्राम।
सभी आसव अरिष्ट एक में मिलाकर उसमें दोनों भस्म व शिलाजीत अच्छी तरह घोल दें। इसे 2 से 4 चम्मच दिन में दो बार बराबर पानी मिलाकर लेना चाहिए।
यह बढ़िया जनरल टॉनिक है। इससे शारीरिक और मानसिक शक्ति बढ़ती है। थकावट, आलस्य, कमज़ोरी दूर होकर चुस्ती-फुर्ती व अच्छी नींद आती है।
**************************************
सफ़ेद मूसली और असगंध समान मात्रा में लेकर कपड़छन चूर्ण बनाएं तथा एक छोटी चम्मच की मात्रा में दूध के साथ सेवन करें। इससे मांस और बल दोनों की वृद्धि होती है।
**************************************
असगंध का चूर्ण सबेरे-शाम 1-1 चम्मच की मात्रा में शहद में मिलाकर चाटने तथा साथ में एक पाव मिश्री मिला गर्म दूध पीते रहने से शरीर का दुबलापन मिटता है।
**************************************
शतावरी, छिलका रहित कौंच के बीज, सफ़ेद मूसली, असगंध, गोखरू- सभी 100-100 ग्राम।
सभी चीज़ों को अलग-अलग कूट-पीसकर कपड़छन चूर्ण करके मिलाकर रख लें। यह चूर्ण सबेरे-शाम खाली पेट थोड़े देशी घी में 5-5 ग्राम मिलाकर सेवन करें। चाहें तो एक पाव मिश्री मिला गुनगुना दूध पी सकते हैं। शाम वाली ख़्ाुराक चाहें तो रात में सोने से आधा घण्टे पूर्व भी सेवन कर सकते हैं। अलबत्ता, भोजन किये हुए कम-से-कम दो घण्टे अवश्य बीत गए हों।
इस प्रयोग से दुबलापन दूर होता है, पौरुषशक्ति बढ़ती है। यह काफ़ी पौष्टिक, धातुवर्द्धक और श्रेष्ठ बाजीकारक नुस्ख़्ाा है। इसे ब्रह्मचर्य के साथ लगभग तीन माह तक प्रयोग करना चाहिए।
**************************************
शरीर दुबला हो और ऐसा किसी विशेष रोग की वजह से न हो तो प्रतिदिन दो पके केले खाकर ऊपर से गर्म मिश्री मिला 1 पाव दूध पिएं। दूध उबालते समय इसमें एक-दो इलायची भी पीसकर मिला दें। तीन चार माह में शरीर मांसल होने लगेगा।
**************************************
50 ग्राम कच्ची मूँगफली के दानों को तीन-चार घण्टे पानी में भिगोकर छिलका उतारकर पीस लें। अब कढ़ाई में 25 ग्राम देशी घी डालकर धीमी आँच पर सेंकें। जब लालिमा आने लगे तो इसमें 25 ग्राम शक्कर मिलाकर 2 नग छोटी इलाइची पीसकर डाल दें।
इस तरह हलवा बनाकर कुछ दिनों तक नियमित खाने से शरीर का दुबलापन दूर होता है।
**************************************
125 ग्राम सालमपंजा तथा 250 ग्राम बादाम मिगी को महीन पीसकर मिला लें।
प्रात: और रात में सोने से पूर्व (भोजन से 2-3 घण्टे बाद) 10-10 ग्राम यह चूर्ण गुनगुने मीठे दूध से सेवन करते रहने से शरीर का दुबलापन व कमज़ोरी दूर होती है तथा यौनशक्ति बढ़ती है। स्त्री-पुरुष दोनों के लिये उपयोगी है।
**************************************
छिलका उतारे हुए 60 ग्राम जौ की आधा लीटर दूध में खीर बनाएं और इस खीर का ही नियमित नाश्ता करें। यदि किसी विशेष बीमारी की स्थिति न हो तो दो माह में इस प्रयोग से दुबलापन दूर होने लगता है।
**************************************
15-20 अच्छे पिंडखजूर, थोड़ी किशमिश, चौथाई चम्मच सोंठ व एक-दो छोटी इलायची को एक पाव दूध में उबालें व एक चम्मच घी मिलाकर लगभग दो माह सबेरे नाश्ते के रूप में सेवन करें। शरीर की दुर्बलता दूर होगी। यह प्रयोग कफ, सर्दी को भी दूर करता है।
शारीरिक सुन्दरता से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है मन और वाणी का सौन्दर्य। बाहरी सुन्दरता तभी तक है जब तक शरीर है, पर मन और वाणी की सुन्दरता चारित्रिक विशेषता है और यह आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर बन जाती है। यही आन्तरिक सौन्दर्य समाज में आपसी सामंजस्य का सबसे बड़ा साधन है। मन और वाणी सुन्दर हों तो न पारिवारिक कलह होंगे, न लड़ाई-झगड़े और न ही दंगे-फ़साद। समाज में आज अगर मार-काट, ठगी-बेईमानी, ईष्र्या-द्वेष का ही माहौल हर तरफ़ दिखाई दे रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह मन और वाणी की कुरूपता ही है।
मन के सौन्दर्य का अर्थ यह है कि हमारी भावनाओं में पवित्रता का प्रवाह हो, हम अपने स्वार्थ के लिए किसी का अहित न सोचें और प्राणिमात्र के प्रति हमारी दृष्टि प्रेमपूर्ण हो। वाणी की सुन्दरता यह है कि किसी का दिल दुखाने के लिए कोई बात हम न बोलें। हमारा स्वभाव सत्य बोलने का हो। भाषा इतनी मधुर हो और अपनी बात रखने का ढंग इतना प्यारा हो कि लोग हमारे स्वभाव की प्रशंसा करते न थकें। कल्पना करिए मन और वाणी की यह सौन्दर्य-साधना बचपन से ही सबको कराई जाए तो पूरा समाज ही कितना सुन्दर हो जाए। क्रूरता और हिंसा का तांडव बंद हो जाए और हर तरफ़ सुख-शांति का साम्राज्य हो।
ं हालाँकि समाज की वर्तमान दिशा और दशा जैसी है उसमें सभी लोगों का एकदम से चारित्रिक सुधार हो जाना आसान बात नहीं है, फिर भी हम व्यक्तिगत रूप से अपने-अपने स्तर पर यह कोशिश तो शुरू ही कर सकते हैं। अपने-अपने स्तर पर हमारी कोशिशों का असर ही हमारे पास-पड़ोसियों और हमारी संतानों पर भी पड़ेगा। इसी तरह से धीरे-धीरे व्यापक स्तर पर सामाजिक सुधार की नींव पड़ जाएगी। कुछ लोग यह मानते हैं कि जिन लोगों की आदतें एक बार बिगड़ चुकी हैं, वे फिर नहीं सुधर सकते; जिनके मन में ईष्र्या-द्वेष की आँधी चल रही है, वे नहीं बदल सकते; याकि जिनकी जुबान से कटुता ही टपकती रहती है, वे वाणी का संयम नहीं कर सकते। इसके विपरीत लेखक का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति में आत्मसुधार का भाव पैदा हो जाए तो वह अपने चरित्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है। यह बात ज़रूर है कि कोई भी परिवर्तन सिर्फ इच्छा मात्र से या आनन-फानन में ही नहीं हो जाता। इसके लिए संकल्प और अभ्यास (साधना) अनिवार्य है।
जो लोग ईमानदारी से चाहते हैं कि उनके मन से कुविचारों का झंझावात समाप्त हो जाए और उसमें शुभ संकल्पों का प्रवाह हो; तथा, उनकी वाणी में मधुरता का वास हो, उनके लिए यहाँ कुछ व्यावहारिक उपाय सुझाए जा रहे हैं। ये उपाय ऐसे हैं, जो सदियों से हमारे पूर्वजों द्वारा आज़माए जाते रहे हैं। वास्तव में भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही चरित्र-सुधार या यूँ कहें कि मनुष्य-निर्माण का एक पूरा सुनियोजित कार्यक्रम ही प्रचलित रहा है और जिसके पालन के संस्कार भी बचपन से ही दिये जाते रहे हैं। इन्हीं संस्कारों के परिणामस्वरूप ही इस देश में अपने स्वार्थों को भुलाकर लोक कल्याण के लिए अपने प्राणों तक की आहुति दे देने वाले लोग प्राय: घर-घर में ही पैदा होते रहे हैं। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति के प्रवाह में फँसकर अपने जीवन मूल्यों को काफ़ी कुछ भुला बैठे हैं और इसी का नतीजा है कि आज देश में गंभीर चारित्रिक संकट उठ खड़ा हुआ है।
दरअसल प्राचीन भारत में लोगों की दिनचर्या का प्राण था - योगाभ्यास (पतंजलि निर्देशित) और ’पंच महायज्ञ’। पंचमहायज्ञों का पालन करते हुए योगमय जीवन अपनाने का ही परिणाम था कि भारत ’विश्वगुरु’ रहा। जिन्हें योग और पंचमहायज्ञ को समग्रता में जानना हो, उन्हें इस विषय के प्राचीन साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। यहाँ सिर्फ इतनी सी सामान्य जानकारी अवश्य दी जा सकती है कि ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, बलिवैश्वदेवयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा पितृयज्ञ को मिलाकर हमारे शास्त्रों में पंचमहायज्ञ नाम दिया गया है। इनमें से ब्रह्मयज्ञ का उद्देश्य यह था कि हमें जिस सृष्टि रचयिता ने पैदा किया हम उसके प्रति कृतज्ञ रहें, आत्मविश्लेषण करके अपनी कमियों को दूर करें, आत्मिकशक्ति बढ़ायें और स्वाध्याय से ज्ञानवृद्धि करें। देवयज्ञ का विधान इसलिए किया गया था कि इस संसार में रहते हुए हम लोग परस्पर सहयोग का तत्त्व सीखें। वैश्वदेवयज्ञ इसलिए किया जाता था कि मनुष्य के अन्दर से अभिमान की भावना दूर रहे। अतिथियज्ञ का उद्देश्य उपदेशकर्त्ता से ज्ञान प्राप्ति तथा उसकी सेवा करना था। सबसे अन्तिम पितृयज्ञ का विधान इस उद्देश्य से किया गया था कि जिन बड़े-बुजुर्गोंं ने हमें पाला-पोसा उनके प्रति हम कृतज्ञता की भावना रखें तथा उनके अनुभवों से अपनी जीवन-यात्रा के लिए ज़रूरी ज्ञान प्राप्त करें।
वास्तव में कोई भी व्यक्ति इन पंचमहायज्ञों के यथार्थ उद्देश्यों को देखकर समझ सकता है कि ये किसी सम्प्रदाय विशेष के लिए न होकर मानवमात्र के लिए हैं और किसी भी समाज की बेहतरी के लिए आवश्यक हैैं। जिनकी रुचि पंचमहायज्ञों के विधि-विधान के बारे में गहरी समझ बनाने की हो, वे चाहें तो स्वामी समर्पणानन्द द्वारा लिखित ’पंचयज्ञ प्रकाश’ नामक पुस्तक पढ़ सकते हैं। यह पुस्तक-समर्पण शोध संस्थान, 4/42 राजेन्द्र नगर, सेक्टर-5, साहिबाबाद, गाजियाबाद (उ.प्र.)-के पते से प्राप्त की जा सकती है।
अब आइए, इस प्राचीन जीवन पद्धति में से हर परिस्थिति के लिए व्यावहारिक कुछ उपायों की चर्चा करें, ताकि जनसामान्य सहजता से इन्हें अपनाकर मन और वाणी के संयम की ओर अपने क़दम बढ़ा सके।
1. यदि अभी तक आपके आहार में तामसिक (मद्य, मांसाहार आदि) चीजें़ शामिल रही हों, तो सबसे पहले इनका सेवन बन्द करिए। यदि आहार साित्त्वक होगा तो मन और विचारों में भी साित्त्वकता का प्रवेश आसानी से होगा। आहार के विषय में इस पुस्तक और ’स्वदेशी चिकित्सा -आसान और कारगर नुस्ख़्ो’ में पर्याप्त जानकारी दी गई है।
2. 6-7 घंटे की पर्याप्त नींद के बाद सबेरे बिस्तर से उठने में यदि आपको आलस्य आता है, तो इस आदत को अविलम्ब त्याग दीजिए। नींद खुलते ही जिसकी असीम कृपा से यह मनुष्य शरीर मिला है, उस परमात्मा को स्मरण करते हुए उठकर बैठ जाइए। दिन भर के ज़़रूरी कामों की रूपरेखा बनाइए और ईश्वर को साक्षी मानकर और बिना किसी प्रमाद के उन्हें पूरा करने का संकल्प धारण कीजिए। इतना करने के बाद शौचादि निवृत्ति के लिए जाइए। शौचादि क्रिया के बाद सबेरे स्नान करते हों तो ठीक, अन्यथा हाथ, पैर व मुँह
धोकर मन व विचार की असली सौन्दर्य-साधना के लिए तैयार होइए। इसके लिए आपको बाहर से किसी तरह के अतिरिक्त साधन जुटाने की ज़रूरत बिल्कुल नहीं है। ज़रूरत है तो सिर्फ प्रतिदिन नियमित रूप से सबेरे-शाम आधा-आधा घंटा समय देने की। इतना समय न दे सकें तो कम से कम 15-20 मिनट तो लगाएं ही। इस समय में आपको नियमित रूप से प्रणव (ओ•म्) का अर्थचिन्तन के साथ जप करना है।
जप का तरीक़ा यह है कि सबसे पहले आप पवित्र भाव के साथ सुखासन या पद्मासन में बैठ जाएं। रीढ़ सीधी रखें। अब कम से कम तीन और अभ्यास अच्छा हो तो अधिक से अधिक 21 प्राणायाम करें। इस दौरान ओम् या प्राणायाम मंत्र (ओं भू: ओं भुव: ओं स्व: ओं मह: ओं जन: ओं तप: ओं सत्यम्) का मानसिक जाप करते रह सकते हैं। प्राणायाम के बाद लम्बी गहरी साँस लेकर धीरे-धीरे मुँह से साँस छोड़ते हुए ’ओम्’ का सस्वर उच्चारण करिए। ओंकार जप के साथ इसका अर्थचिन्तन भी अवश्य करिए। शुरू में ’ओ•म्’ का उच्चारण करने के बाद थोड़ी देर रुककर अर्थ का विचार कर सकते हैं, बाद में जप के साथ ही अर्थ की भावना करने का भी अभ्यास हो जाता है।
जहाँ तक ’ओ•म्’ के अर्थ का सवाल है तो इसमें शामिल अकार, उकार और मकार से ईश्वर के वाचक बहुत से नाम बनते हैं, पर सामान्यत: ’ओ•म्’ के ’सर्वरक्षक’ अर्थ की भावना कर सकते हैं। अर्थात् अपनी बुरी आदतों के प्रति प्रायश्चित का भाव रखते हुए स्मरण करिए कि परमात्मा सर्वरक्षक है, वह हमारी हर प्रकार के दुर्गुणों से रक्षा करे और हममें भी दूसरों के प्रति रक्षक बनने का भाव प्रबल हो। अलबत्ता, अपनी जिन बुराइयों को आप दूर करना चाहते हैं उन पर क्रमश: एक-एक करके अभ्यास करें और संकल्प के साथ-साथ आत्मसुधार के लिए पुरुषार्थ करें तो एक दिन आप पाएंगे की अपनी तमाम बुरी आदतों पर आपने नियंत्रण कर लिया है। ’ओ•म्’ का जप आप सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों समय नियमित करें। जप के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात अर्थ की भावना है। याद रखें कि सिर्फ मिश्री-मिश्री चिल्लाने से मुँह मीठा नहीं होता। इसलिए जो लोग मन्त्रों का सिर्फ उच्चारण करते हैं, उनकी जप क्रिया को निष्फल ही समझिए। चरित्र में सार्थक बदलाव लाने के लिए तो महर्षि पंतजलि के ’तज्जपस्तदर्थभावनम्’ योगसूत्र के अनुसार ही जप करना चाहिए। जो लोग विधिपूर्वक ध्यान-संध्या करते हैं, उन्हें तो ख़्ौर यह सब समझाने की ज़रूरत ही नहीं है।
3. आपकी जो भी बुरी आदतें हों, उन्हें स्पष्ट रूप से एक पर्ची या डायरी में लिखें। दिन में यदा-कदा इन्हें पढं़े और दुर्गुणों को दूर करने का संकल्प दोहराएं। मान लीजिए कि आपको गुस्सा बहुत जल्दी आता है तो सबसे पहले ध्यान दीजिए कि आपको किन स्थितियों में गुस्सा जल्दी आता है और फिर वैसी स्थितियों की संभावना बनते ही अपना संकल्प दोहराना शुरू कर दीजिए और धैर्य से काम लेने की मानसिकता बनाइए। यदि गुस्सा आने ही लगे तो धीरे-धीरे गहरी साँस लेकर धीरे-धीरे ही छोड़ने का प्राणायाम करिए। इससे क्रोध पर काबू पाना आसान हो जाएगा। कुछ दिनों तक जैसे तैसे भी अगर आप यह अभ्यास कर ले गए तो धीरे-धीरे गुस्सा न करने की आपकी सहज प्रवृत्ति ही बन जाएगी। इसी तरह एक-एक कर अपने अन्य दुर्गुणों से भी छुटकारा पा सकते हैं।
4. रात में सोने से पूर्व अपने दिन भर के अभ्यास और किए गए कार्यों की समीक्षा अवश्य करें। जितने अंश में आपको सफलता मिली हो, उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दीजिए और यदि कुछ त्रुटि रह गई हो तो उसके लिए प्रायश्चित्त का भाव बनाइए और अपनी संकल्प-शक्ति को और मज़बूत बनाकर ’ओ•म्’ का मानसिक जप करते हुए सोने की तैयारी करिए। वैसे तो प्रात:जागरण, शयनकालीन और संध्या के लिए वेदों में बड़े सुन्दर मंत्र हैं, जिनकी विशेष रुचि हो वे अलग से जानकारी कर सकते हैं। इसके अलावा आत्मसुधार के इच्छुक लोगों को महात्मा गाँधी की आत्मकथा(मेरे सत्य के प्रयोग) भी अवश्य पढ़नी चाहिए।
यह मन और विचार को सुन्दर बनाने का अनुभूत अभ्यासक्रम है। लेखक ने ध्यान-संध्या के अभ्यास से अपने कई दुगुर्णों को दूर भगाने में सफलता पाई है, इसलिए उम्मीद है कि जनसामान्य को भी इस तरह के अभ्यासक्रम से अवश्य ही लाभ होगा।
कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों से सावधान !
एक फोटो स्टूडियो वाले ने एक ही साइज़ के फोटो खिंचवाने के तीन रेट लिख रखे थे-10 रु., 20 रु. और 30 रु.। एक ग्राहक ने उत्सुकता जताते हुए पूछा - क्यों जनाब ! एक ही साइज़ के फोटो उतारने के तीन तरह के रेट क्यों लिख रखे हैं? क्या लोग इतने मूर्ख हैं, कि जो फोटो 10 रु. में उतर सकता है, उसके 30 रु. दें? फोटोग्राफर बोला-देखिए महाशय, लोग मूर्ख हैं या बुद्धिमान, इस पर तो मैं कोई टिप्पणी नहीं कर सकता, पर इतना सत्य जानें कि जब से मैंने स्टूडियो खोला है तब से जितने भी ग्राहक आ रहे हैं, सब खिंचवाते 30 रु. रेट वाला ही फोटो हैं। आज तक कोई 10 रु. या 20 रु. वाला फोटो खिंचवाने को तैयार नहीं हुआ। ग्राहक चकित होकर बोला-क्यों भई ऐसा क्यों? तो फोटोग्राफर ने समझाते हुए कहा- इसकी वजह यह है कि 10 रु. वाला फोटो वैसा उतारा जाता है जैसे कि आप वास्तव में हैं, 20 रु. वाला वैसा उतारा जाता है जैसे कि आप दिखाई देते हैं; और 30 रु. वाला वैसा उतारा जाता है जैसे कि आप दिखाई देना पसन्द करते हैं। दरअसल कोई भी वैसा दिखना नहीं चाहता जैसा वास्तव में होता है या जैसा दिखता है और इसलिए सब 30 रु. देकर वैसा ही फोटो उतरवाते हैं जैसे कि वे दिखाई देना पसन्द करते हैं।
यह बोधकथा जिस मानसिकता को उजागर करती है, यह वास्तव में वही मानसिकता है जिसके चलते भाँति-भाँति के कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों की बाढ़ सी आ गई है। लोग दरअसल जैसा दिखना पसन्द करते हैं, वैसा दिखने के लिए ही तरह-तरह के बाज़ारू सौन्दर्य प्रसाधनों को आज़माने में लगे हुए हैं। गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह ब्यूटी पार्लर खुलने लगे हैं तो इसकी भी वजह वही है। यूँ सुन्दर दिखना कोई बुरी बात नहीं है, पर सुन्दरता में इतनी कृत्रिमता आ जाए, सौन्दर्यबोध विकृत हो जाए और दो पल की चमक-दमक के पीछे लोग प्रकृति, स्वास्थ्य और अपनी संस्कृति तक भूल जाएं, तो बात चिन्ताजनक हो जाती है। महिलाएं जिस तरह से इस बाज़ारू सौन्दर्य के मायाजाल में फँस रही है वह ज़्यादा गंभीर स्थिति है, इसलिए कि महिलाएं ही वास्तव में सांस्कृतिक परम्पराओं के निर्वहन का सबसे अहम दायित्व निभाती रही हैं।
लेखक देश की नारियों को इस बात के लिए सचेत करना अपना कर्तव्य मानता है कि अगर वे बाज़ारू सौन्दर्य प्रसाधनों के पीछे की पागल दौड़ में शामिल हो रही हैं तो निश्चित जान लें कि वर्तमान और भावी पीढ़ियों के चारित्रिक पतन की आधारभूमि भी तैयार कर रही हैं। इसके अलावा बनावटी सौन्दर्य के इस पश्चिमी तौर-तरीक़े के चलते सौन्दर्य प्रसाधनों के निर्माण के लिए जिस तरह से जीव-जन्तुओं की बड़े पैमाने पर क्रूर हत्याएं की जा रही हैं ,वह भी निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के खिलाफ है । होठों को लिपिस्टिक से लाल करते समय यह बात एक बार ज़रूर याद कर लेना चाहिए कि इसे बनाने के लिए जाने कितने पशु-पक्षियों का ख़्ाून निचोड़ा गया होगा। संवेदनशील व्यक्ति के लिए कितना हृदय विदारक दृश्य होता होगा जबकि ‘स्लेण्डलोरिस’ नामक बन्दर की आँखें और दिल निकालकर बेस पाउडर जैसी चीज़ें बनाने में इस्तेमाल की जाती होंगी। भाँति-भाँति के इत्रों की खुशबुओं में तर रहने वाले लोगों को शायद ही मालूम होगा कि बिज्जू को बेंतों से पीटा जाता है और उसकी ग्रन्थियों को चाकू से खरोंचा जाता है तो वह व्यग्र होकर एक प्रकार का स्राव छोड़ता है। इसी स्राव को इकट्ठा करके तरह-तरह के सेण्ट (इत्र) बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। तालाबों से कछुए पकड़कर मारना और उनका तेल निकालकर सौन्दर्य प्रसाधन निर्माताओं को बेचना तो जैसे कुछ जातियों का पेशा ही बनता जा रहा है। स्थिति यह है सौन्दर्य प्रसाधनों के अंधाधुंध व्यापार के चलते जीव-जन्तुओं की तमाम प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर पहुँच गई हैं।
इस तरह के बाक़ी सारे मुद्दों को किनारे रखते हुए सिर्फ स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो भी कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों से यथासंभव दूरी बनाये रखने में ही भलाई है। भाँति-भाँति के शैम्पू, साबुन, क्रीम, फेस पाउडर, टेल्कम पाउडर, नेल पालिश, पालिश रिमूवर, हेअर डाई, हैंड व बाडी लोशन, आई लाइनर, हेअर रिमूवर, हेअर स्प्रे, आई शैडो, लिपिस्टिक, परफ्यूम आदि जितनी भी सौन्दर्य प्रसाधन की चीज़ें हैं, ज़्यादातर में हानिकारक क़िस्म के रसायन होते हैं। लिपिस्टिक में इस्तेमाल किये जाने वाले रसायन इतने नुकसानदेह होते हैं कि अक्सर इनके प्रभाव से होठों का प्राकृतिक रंग तक समाप्त हो जाता है और उन पर सफ़ेद धब्बे उभर आते हैं। महिलाओं के होठों के काले पड़ जाने के पीछे भी सबसे बड़ा कारण रसायन मिश्रित लिपिस्टिक ही है। लिपिस्टिक में कई तरह के अघुलनशील एवं अखाद्य रंग आदि पदार्थ मिले होते हैं। इनमें मिलाए जाने वाले मोम, सीसा और कैडमियम जैसे पदार्थ भी शरीर के लिए नुकसानदेह ही होते हैं। ये पदार्थ होठों के सहारे पेट में पहुँचते हैं तो शारीरिक विकृतियों, एलर्जी तथा कैंसर जैसे रोगों के कारण बनते हैं। एओसिन, एमरेन्थ, बिस्मथ, रोडोगाइन-बी, टारटूजीन, लैनोनिन सरीखे तत्त्व भी हर तरह से हानिकारक ही हैं। एमरेन्थ तो प्रजजन प्रणाली तक में विकृतियाँ पैदा कर देता है।
यह भी एक भ्रम है कि सख़्त नाखुनो के ऊपर लगे होने के कारण नेल पालिश से कोई नुकसान नहीं हो पाता। वास्तव में नेल पालिश में कई तरह के जटिल रसायन मिले होते हैं। ऐसे में इसके नियमित इस्तेमाल से नाख़ून रोगग्रस्त हो सकते हैं। नेल पालिश नाखुनो की प्राकृतिक चमक को तो नष्ट करता ही है, वे कमज़ोर होकर टूटने लगते हैं और खुरदुरेपन के शिकार भी हो सकते हैं। इसी तरह नेल पालिश रिमूवर के इस्तेमाल से भी नाख़ून और समीप की त्वचा पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
सुहाग के प्रतीक के तौर पर प्रयोग किया जाने वाला सिन्दूर आज जिस तरह से बनाया जाता है वह भी कम घातक नहीं है। सिन्दूर में प्राय: बेहद ख़तरनाक क़िस्म का रसायन लेड आक्साइड मिला होता है। इसका विषैला प्रभाव कैंसरकारक तो है ही, यह रक्त में पहुँचकर हीमोग्लोबिन के निर्माण को प्रभावित करके रक्ताल्पता भी पैदा कर सकता है। गर्भस्थ शिशु भी इससे प्रभावित हो सकता है। इसलिए एक तो महिलाएं रसायन मिश्रित सिन्दूर की जगह माँग में प्राकृतिक लालिमा लगाएं तो अति उत्तम; अन्यथा, सिन्दूर लगाएं भी तो कम से कम मात्रा में लगाएं और जिस हाथ से लगाएं उस हाथ को अच्छी तरह से अवश्य धो लें। सिन्दूर की ही भाँति आजकल बाज़ारों में बिकने वाला सुरमा भी अक्सर अपमिश्रित होता है। आजकल के सुरमा निर्माता कम लागत में ज़्यादा मुनाफ़ा बटोरने के लोभ में प्राकृतिक उपादानों के बजाय लेड सल्फाइड जैसे ज़हरीले रसायन इस्तेमाल करने लगे हैं। लगभग ऐसा ही हाल काजल का भी है। आँखें कजरारी करने के चक्कर में कई बार आँखों की रोशनी तक चली जा सकती है। बेहतर है कि काजल या सुरमा घर में ही शुद्धता से बना लिया जाय। बाज़ार से ख़्ारीदना पड़े तो विश्वसनीय आयुर्वेदिक सुरमा या काजल ही लेना चाहिए। माथे पर लगाई जाने वाली छोटी सी बिन्दी के पीछे चिपकाने के लिए लगा गोंद अगर अच्छे दजऱ्ें का न हो तो वह भी नुकसानदेह हो सकता है। जहाँ बिन्दी चिपकाई जाती है वहाँ की खाल उधड़ सकती है, खुजली हो सकती है और दूसरे क़िस्म के चर्मरोग भी हो सकते हैं। इसलिए बिन्दी लगाने में भी सावधानी बरतने की ज़रूरत है।
तमाम तरह के सुगन्धित सौन्दर्य प्रसाधन शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। इस तरह के प्रसाधनों के निर्माण में लगभग 5000 प्रकार के घटक द्रव्य इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें से कोई भी घटक त्वचा में एलर्जी, जलन या विकार पैदा कर सकता है। आजकल पसीना निरोधक प्रसाधनों का व्यापक उपयोग होने लगा है। ऐसे प्रसाधनों को लगाने से त्वचा के रोमछिद्र बन्द हो जाते हैं और पसीने के जरिए शरीर के विजातीय तत्त्व बाहर नहीं निकल पाते। नतीजन ,त्वचा पर बुरा असर तो होता ही है, गुर्दों पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ता है और वे विकारग्रस्त हो सकते हैं। ऐसे प्रसाधनों में प्राय: आक्सीक्विनोलिन सल्फा नामक रसायन मिला रहता है जो केन्द्रीय नाड़ी संस्थान पर बुरा प्रभाव डालता है। इसके अलावा इस तरह के प्रसाधनों में जिंक सल्फोकार्बोनेट, प्रोपेलिन ग्लाइकोल, कास्टिक, बेंजोइक अम्ल, फ्लोरल हाइड्रेट तथा फार्मेल्डिहाइड जैसे हानिकारक रसायन भी मिले होते हैं, जो त्वचा में जलन, एलर्जी या दूसरी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। इनमें से फार्मेल्डिहाइड शैम्पू, एण्टिसेप्टिक क्रीम, प्रिजर्वेटिव, नाखुनो को सख़्त बनाने वाले घोलों, स्नानघर में प्रयुक्त होने वाले पदार्थों आदि में भी मिलाया जाता है। इसका विषैला प्रभाव कैंसर रोगियों की संख्या में बढ़ोत्तरी कर रहा है।
बालों को हेअर डाई से रंगने का प्रचलन जिस रफ़्तार से बढ़ रहा है, वह भी कम हानिकारक नहीं है। हेअर डाई में मिला हुआ विषैला रसायन पैराफिनेलेन डाई एमीन रोग प्रतिरक्षक प्रणाली पर बुरा प्रभाव डालता है। इसमें कई ऐसे रसायन मिले होते हैं जो शरीर में एलर्जी की समस्या पैदा कर सकते हैं। कई हेअर डाई त्वचा में जलन, पीड़ा व चकत्ते की समस्या उत्पन करते हैं। हेअर डाई की गन्ध से सर्दी-जुकाम की भी समस्या पैदा हो सकती है। इसी तरह से मिनी आक्सीडिल रसायन मिले हुए हेअर क्रीम व लोशन के अधिक इस्तेमाल से सिर में भारीपन, झनझनाहट, धमक व झुंझलाहट बढ़ती है व निम्न रक्तचाप हो सकता है।
ब्यूटी पार्लरों की दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ती तादाद को देखते हुए इनके भी नुकसानदेह पक्ष पर एक नज़र डालना ज़रूरी है। ब्यूटी पार्लरों के सौन्दर्य प्रसाधनों में प्रमुख रूप से अमोनिया, हाईड्रोजन-पर-आक्साइड, चर्बी, एसीटोन वैक्सीन, वैसलीन, जिंक, स्पिरिट, अल्कोहल, ग्रीस जैसे पदार्थ प्रयोग किये जाते हैं। वास्तव में ये सभी चीज़ें त्वचा को किसी न किसी प्रकार से हानि पहुँचाती हैं। त्वचा में निखार लाने के लिए ब्लीचिंग की जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसमें अमोनिया का इस्तेमाल होता है और यह त्वचा को जलाकर कड़ी कर देता है। बालों को काला करने के लिए ब्यूटी पार्लरों में हाइड्रोजन पर-आक्साइड और आर्गेनिक हाइड्रोकार्बन जैसे रसायन प्रयोग किए जाते हैं। ये इतने नुकसानदेह होते हैं कि बालों का झड़ना और पकना दोनों ही तेज़ हो जाते हैं। हेअर स्पे्र जैसे साधनों से भी सिर में जलन और सूजन की समस्या पैदा हो सकती है।
कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों के इतने सारे नुकसानों को जानने के बाद भी अगर लोग इनके अंधाधुंध इस्तेमाल से बाज न आएं और ब्यूटी पार्लरों के चक्कर लगाएं तो इसे एक तरह के पागलपन के अलावा और क्या कहा जा सकता है? वास्तव में कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों के पीछे भागने के बजाय नींबू, खीरा, नीम, तुलसी, बेसन, गुलाबजल, चन्दन, चिरौंजी, दूध, हल्दी, दही, बादाम आदि ढेरों प्राकृतिक चीज़ों के सहारे सौन्दर्य को ज़्यादा बेहतर तरीक़े से निखारा जा सकता है। यह भी मजे़ की बात है कि जो फ़िल्मी अभिनेत्रियाँ कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों का दिन-रात विज्ञापन करती नज़र आती हैं वे ख़्ाुद निजी तौर पर इनसे दूर ही रहती हैं। पत्रिकाओं-अख़बारों में प्रकाशित होने वाले अभिनेत्रियों के व्यक्तिगत साक्षात्कारों से इस तथ्य का खुलासा होता है कि वे अपना रूप और लावण्य बनाये रखने के लिए प्राकृतिक-आयुर्वेदिक उपायों को ही प्राथमिकता देती हैं। ऐसे में देश की नारियों को विशेष रूप से चाहिए कि वे विज्ञापनी मायाजाल से बाहर आएं और कृत्रिमता से दूर हटकर प्राकृतिक सौन्दर्य प्रसाधनों को अपनाएं। इस तरह से यदि देश की स्त्रियाँ ऐसा करने लगें तो वे अपने स्वास्थ्य और अपनी संस्कृति दोनों की रक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
सुन्दरता का शत्रु है साबुन
दुनिया का शायद ही कोई कोना ऐसा होगा, जहाँ साबुन का साम्राज्य न फैला हुआ हो। आज की पीढ़ी को नहाने के समय साबुन की ज़रूरत कुछ वैसे ही महसूस होती है जैसे कि भूख के समय भोजन की। शायद ही इने-गिने लोग हों जो साबुन के गुलाम न होंगे। आदत तो कुछ ऐसी हो गई है कि अगर एक-दो दिन भी बग़ैर साबुन के नहाना पड़ जाय तो लगता है कि जैसे कई दिनों से शरीर पर पानी ही न पड़ा हो।
वास्तव में विज्ञापनी मायाजाल ने साबुन को हमारी अनिवार्यताओं में शामिल कर दिया है। अन्यथा, त्वचा के स्वास्थ्य की दृष्टि से साबुन एकदम गै़रज़रूरी और नुकसानदेह चीज़ है। साबुन में इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन तमाम चर्मरोगों के कारण बनते हैं। हालाँकि जैसे-जैसे लोगों की स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ रही है वैसे-वैसे त्वचा के प्रति अहानिकर होने का दावा करने वाले साबुनों की संख्या भी बढ़ने लगी है। कई साबुन निर्माता दावा करते हैं कि उनका साबुन रसायन मुक्त है या जड़ी-बूटियों के मिश्रण से बनाया गया है, परंतु यह अच्छी तरह याद रखना चाहिए कि उच्च से उच्च कोटि के साबुन में भी झाग पैदा करने के लिए कम से कम एक नुकसानदेह रसायन एस.एल.एस. (सोडियम लॉरेल सल्फेट) तो प्राय: मिलाया ही जाता है। अलबत्ता, कुछ निर्माता साबुन या शैम्पू के रैपर पर जड़ी-बूटियों की लंबी फेहरिस्त तो लिखते हैं पर हानिप्रद रसायन मिलाने के बावजूद इनका नाम नहीं देते। भक्त क़िस्म के जो लोग साबुन मल-मलकर नहाने के बाद पवित्र (?) होकर घंटों भजन-पूजन करते हैं, उन्हें यह अच्छी तरह याद रखना चाहिए कि ज़्यादातर साबुनों में बूचड़ख़्ाानों से भारी मात्र में निकली चर्बी धड़ल्ले से मिलाई जाती है।
जो लोग यह सोचकर शरीर पर साबुन मलते हैं कि इससे मैल साफ़ होती है या सौन्दर्य में निखार आता है, वे बहुत हद तक भ्रम में जीते हैं। याद रखें कि साबुन से अगर कुछ ऊपरी गंदगी साफ़ होती है तो रसायनों की कहीं ज़्यादा ख़्ातरनाक गंदगी त्वचा के रोम छिद्रों से शरीर के भीतर भी प्रवेश कर जाती है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आजकल की अपने को सभ्य और आधुनिक समझने वाली कई माँएं अपने नन्हे-मुन्ने शिशुओं तक को भाँति-भाँति के साबुनों से ख़्ाूब रगड़-रगड़कर इसलिए नहलाती हैं कि इससे धीरे-धीरे उनके वर्ण में कुछ निखार आ जाएगा। अब इन सभ्य क़िस्म की मूर्ख माताओं को कौन समझाए कि अपने बच्चों का हित साधने की कोशिश में वे उनका अहित ही कर रही हैं। साबुन रगड़ने से रंग सुधरने के बजाय त्वचा कुछ बदरंग ही होगी, यह तय है। भाँति-भाँति के ‘बेबी-सोप’ भी अंतत: निरापद नहीं हैं।
ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि जो फ़िल्मी हिरोइनें साबुनों के लुभावने विज्ञापनों में नज़र आती हैं वे ही अपनी असली ज़िन्दगी में उन साबुनों को इस्तेमाल करने लायक़ नहीं समझतीं। साबुन के बजाय अपनी सौन्दर्य-रक्षा के लिए वे प्राकृतिक और घरेलू तरीक़े ही ज़्यादा अपनाती हैं।
साबुन विरोधी इतनी बातों के बाद सवाल यह है कि अब अगर साबुन न लगाएँ तो कैसे नहाएं ? साबुन लगाने की जिनकी रोज़ की आदत है, उनके लिए बगै़र साबुन के स्नान की कल्पना तो और भी कष्टदायी है। पर यह वास्तव में एकदम से मुश्किल नहीं है। मन को थोड़ा दृढ़ कर लीजिए तो साबुन की ज़रूरत बड़ी आसानी से समाप्त हो जाएगी। त्वचा प्रकरण में वर्णित नुस्ख़ों में साबुन के कई बेहतर घरेलू विकल्प मिल जाएँगे। उन्हें इस्तेमाल करके त्वचा के सौन्दर्य की ज़्यादा अच्छी देखभाल की जा सकती है। यूँ शरीर पर कुछ भी न लगाएं तो भी नहाते समय गीले तौलिये से रगड़-रगड़कर त्वचा की सफ़ाई कर लेना पर्याप्त है। अगर तेल मालिश करते हों तो एक छोटी तौलिया अलग से रखें। स्नान के बाद इसी सूखी तौलिया से शरीर को रगड़-रगड़कर पोंछ लें, तो आपकी त्वचा स्निग्ध और स्वस्थ तो बनेगी ही और साबुन की ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी। इसके अलावा सुविधा हो तो बेसन, मुलतानी मिट्टी और कई तरह के उबटन बेहतर विकल्प हैं। इनकी विधियाँ इसी पुस्तक के ‘त्वचा प्रकरण’ और ‘स्वदेशी चिकित्सा’ नामक पुस्तक में वर्णित हैं। आगे के पृष्ठों पर वर्णित दूध से दाढ़ी बनाने और नहाने का नुस्ख़ा भी आज़मा सकते हैं। अब यदि इतने पर भी साबुन को अलविदा कह पाना मुश्किल ही लग रहा हो तो नीम, रीठा, शिकाकाई आदि जड़ी-बूटियों के योग से बने कुछ अच्छे क़िस्म के साबुन यदा-कदा इस्तेमाल किए जा सकते हैं। बच्चों के लिए साबुन के बजाय स्नान कराने से पहले उबटन लगाना सबसे अच्छा उपाय है।
टूथब्रश़: स्वास्थ्य का साधन या रोगाणुओं की सराय
हमेशा स्वास्थ्यप्रद आहार-विहार का पालन करने वाले भी अगर अचानक बीमार पड़ जाएं तो हो सकता है कि उन्हें उनकी बीमारी रोज़मर्रा इस्तेमाल होने वाले उन्हीं के टूथब्रश से उपहार में मिल गई हो। जी हाँ, दाँतों, मसूडों को स्वस्थ,सुंदर रखने की मंशा से अपनाया जाने वाला स्वास्थ्य का यह साधन कभी भी बीमारियों की सौग़ात ला सकता है।
यह ताज्जुब की बात ज़रूर लग सकती है, पर है एकदम सच। और, यह आश्यर्चजनक खोज की है स्वानंद अनुसंधान पीठम, पुणे के डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की एक टीम ने। आज़ादी बचाओ आन्दोलन के यवतमाल (महाराष्ट्र) जिले के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता जितेन्द्र लोड़या और उनके चिकित्सा विशेषज्ञ साथियों की टीम फिलहाल टूथब्रश के नुकसानदेह पहलुओं को काफ़ी गम्भीरता से आमजन के बीच उजागर करने में लग गए हैं। शुरूआती दौर में ही टूथब्रश में पनपने वाली कई बीमारियों के जीवाणु ढूँढ़ निकाले गये हैं। इनमें हैजा जैसे संक्रामक रोगों तक के भी जीवाणु शामिल हैं। सेहत बरक़रार रखने के नाम पर पूरी दुनिया में इस्तेमाल हो रहे टूथब्रश के कई दूसरे नुकसान तो ख़ैर पूरी रिपोर्ट आ जाने के बाद ही पता चलेंगे, पर शुरूआती सूचनाओं से ही ख़तरे का संकेत तो मिल ही जाता हैै।
टूथब्रश और टूथपेस्ट जैसी चीज़ों के परीक्षण में लगे चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार मुँह से निकली गन्दगी की एक परत दरअसल टूथब्रश में नीचे की ओर ब्रश की जड़ों में धुलने के बाद भी अक्सर जमी ही रहती है। अब ऐसा तो होता नहीं कि ब्रश करने के बाद आप पानी गरम करें और उसमें टूथब्रश अच्छी तरह धुलकर रखें। यूँ गरम पानी से भी कोई गारण्टी नहीं है कि ब्रश की जडें़ ठीक से धुल ही जाएँ। वैसे भी काफ़ी साफ़-सुथरी चिकनी चीज़ों को लगातार पानी से साफ़ करते रहने पर भी हफ्ते दो हफ्ते में जब साबुन वग़ैरह से अच्छी तरह रगड़ने की ज़रूरत महसूस होने लगती है, तो फिर साल-छ: महीने लगातार इस्तेमाल होने वाले टूथब्रश को साफ़ रख पाना कितना कठिन होगा, यह समझा जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रश की जड़ों में जमी गन्दगी तरह-तरह की बीमारियों के जीवाणुओं के पनपने का अच्छा साधन है। इसके अलावा टूथब्रश सामान्यत: बाथरूम में लगे किसी स्टैण्ड पर ही रखे जाते हैैं। आधुनिकता के चलते लैट्रिन और बाथरूम अक्सर एक साथ जुड़े तो रहते ही हैैं। ऐसे में पूरे घर में तरह-तरह के रोगाणुओं की संभावना वाली एकमात्र यही जगह है। स्पष्टत: यहाँ रखे टूथब्रश में जमे अन्न-कण रोगाणुओं के लिए आकर्षण का केन्द्र बड़ी आसानी से बन ही जाते हैं और इस तरह इनका हमारे शरीर में पहुँचना एकदम आसान हो जाता है। कहने का अर्थ यह है कि तमाम तकनीकी बाज़ीगरी दिखाने के बावजूद भाँति-भाँति के टूथब्रश अंतत: निरापद नहीं ही हैं।
स्वास्थ्य की दृष्टि से निश्चित रूप से सबसे अच्छा उपाय नीम या बबूल की दातून है, पर दुर्भाग्य कि मुनाफ़ाखोरों की बिरादरी ने आधुनिकता और क्वालिटी के नाम पर दातून को दकियानूसी और घटिया प्रचारित कर-करके उसे हाशिए पर पहुँचा दिया। आज हालत यह हो गई है कि गाँव तक के लोग ब्रश से दाँत रगड़ते मिल जाते हैं। यह टूथब्रश और टूथपेस्ट का ही कमाल है कि आजकल के युवाओं की बत्तीसी कम उम्र में ही जवाब देने लगती है। कितनी विडम्बनापूर्ण स्थिति है कि विदेशी लोग टूथब्रश से तौबा करके हिन्दुस्तानी नीम की दातून के हिमायती बन रहे हैं और हिन्दुस्तान के नौनिहाल अपनी ही उच्च क्वालिटी की विरासत को भुलाने में लगे हैं।
शीतल पेय भी हैं सौन्दर्य के शत्रु
’लाइफ स्टेटस’ का प्रतीक बन चुके कोका-पेप्सी जैसे शीतल पेय स्वास्थ्य और सौन्दर्य की दृष्टि से धीमे ज़हर ही हैं। शीतल पेय ज़्यादा पीने से होठों व त्वचा का रूखापन तो बढ़ता ही है, बुढ़ापे का आक्रमण भी जल्दी होता है। पर इस ज़माने की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि लोग बेवकूफ़ियाँ करते जाते हैं और तब तक नहीं चेतते जब तक कि पानी नाक से ऊपर नहीं पहुँच जाता। मैक्सिको में पानी सचमुच लोगों की नाक तक पहुँच आया है तो अब वे चेतने और चेताने का ज़ोर-शोर से अभियान शुरू कर रहे हैं। यह अभियान पेप्सी, कोका जैसे विभिन्न ब्रांड के शीतल पेयों के ही ख़्िालाफ़ है। मैक्सिकोवासी और मामलों में भले ही फिसड्डी हों, पर पेप्सी और कोकाकोला जैसे पेय गटकने की बहादुरी में दुनिया भर में अव्वल नम्बर पर रहे हैं। मैक्सिको का आम आदमी साल भर में औसतन 160 लीटर शीतल पेय उदरस्थ कर जाता है। यानि मैक्सिको के लोग नशे की हद तक शीतल पेयों की गिरफ़्त में हैं। नतीजा यह है कि वहाँ के लोगों की खान-पान की आदतें गड़बड़ा गई हैं और काफ़ी लोगों को शीतल पेयों के साइड-इफेक्ट्स झेलने पड़ रहे हैं।
पिछले एक साल पूर्व हालात बिगड़ते दिखे तो मैक्सिको के डॉक्टरों और उपभोक्ता मामलों में नज़र रखने वाली संस्था ने मिलकर शीतल पेयों के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर व्यापक अध्ययन और परीक्षण करके एक चौंकाने वाली रिपोर्ट प्रस्तुत की है। रिपोर्ट में आश्चर्यजनक रूप से कुछ वैसी ही बातें उभरकर आई हैं जैसी कि भारत में बहुराष्ट्रीय गुलामी के ख़्िालाफ़ संघर्ष कर रहा आज़ादी बचाओ आंदोलन लंबे अरसे से करता रहा है। मैक्सिको के डॉक्टरों की रिपोर्ट इतनी प्रभावी और प्रामाणिक है कि पेप्सी और कोक जैसी कंपनियों की बोलती बंद है और वे कोई भी सफ़ाई देने से कतरा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक शीतल पेय ज़्यादा पीने से डि-कैल्सीफिकेशन जैसी ख़्ातरनाक बीमारी हो सकती है। सिरदर्द, गैस्ट्रिक अल्सर व चिंता जैसी बीमारियों का खतरा तो बना ही रहता है। मैक्सिकन एसोसिएशन ऑफ स्टडीज फॉर कंज्यूमर डिफेन्स और चिकित्सकों के स्वास्थ्य अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार इन शीतल पेयों में प्रोटीन, विटामिन व खनिज पदार्थों की मात्रा शून्य होती है। इसलिए इन्हें लेने से भूख घट जाती है और कुपोषण हो सकता है। स्वास्थ्य अध्ययन की विभिन्न रिपोर्टों से यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि कोला पेय ऐसे पदार्थों से बनाए जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। कैफीन, फॉस्फेट जैसी चीज़ों की मौजूदगी से दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर असामान्य तो होते ही हैं, रिफाइण्ड शर्करा और फ्रक्टोज जब फॉस्फोरिक अम्ल के साथ मिलते हैं तो फॉस्फोरस और कैल्सियम का संतुलन भी बिगड़ जाता है। नतीजतन बच्चों, किशोरों और महिलाओं को विशेष रूप से हड्डी संबन्धी तकलीफ़ों से गुज़रना पड़ सकता है। डॉक्टरों ने चौंकाने वाली एक नई जानकारी यह दी है कि
कोला को भूरा रंग देने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ई-150 जैसे डाई से शरीर में विटामिन बी-6 की कमी हो सकती है।
फिलहाल मैक्सिको में शीतल पेयों से होने वाले ख़्ातरों के प्रति सावधान करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस से लेकर जगह-जगह कार्यशालाएं तक आयोजित की जा रही हैं। इन आयोजनों के मार्फत एक तरफ़ लोगों को पोषण संबंधी ज़रूरतों के बारे में जानकारी दी जा रही है, दूसरी तरफ़ इन कार्बोनेटेड शीतल पेयों के नुकसानों के प्रति लोगों को सावधान किया जा रहा है। शुभ संकेत यह है कि कोला विरोधी मुहिम को मैक्सिको के लोगों का ज़बरदस्त समर्थन मिलना शुरू हो गया है और वे कोला कंपनियों के विज्ञापनी भ्रमजाल से बाहर निकलने को कसमसाने लगे हैं।
मुश्किल हिन्दुस्तान की ’सांस्कृतिक बंदर’ बनती जा रही पीढ़ी के लिए है। यह पीढ़ी तो आधुनिकता की बयार में बेरोक-टोक बही जा रही है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ नवजवानों को ’कल्चर्ड’ बनाने के लिए लाखों डॉलर विज्ञापनों पर पानी की तरह बहा रही हैं और नतीजे के तौर पर देश के नवजवानों पर कल्चर्ड होने की खुमारी भी क़ायदे से चढ़ने लगी है। अलबक्ता, आज़ादी बचाओ आंदोलन जैसे संगठन शीतल पेयों को कार्बोनेटेड ज़हरीला पानी, लहर पेप्सी को ज़हर पेप्सी और कोकाकोला को धोखा कोला की संज्ञा देकर लोगों को उनके ख़्ातरों से सावधान करने के लिए कमर कसे हुए हैं।
इस मुहिम का नतीजा कुछ तो हुआ है कि अब हिन्दुस्तान में भी तमाम लोग इन शीतल पेयों से तौबा करने का मन बनाने लगे हैं। इनमें ऐसे भी धनी टाइप के लोग शामिल हैं जिन्होंने अपने घरों में पेप्सी-कोक के कैन पर कैन बतौर स्टॉक जमा कर रखे हैं। मुश्किल ये है कि जब इन्हें अहसास हुआ है कि स्टैण्डर्ड बनाने के चक्कर में पेप्सी-कोक का एक घूँट भी हलक नीचे उतारना मूर्खता के अलावा और कुछ नहीं है तो ये लोग इन शीतल पेयों के ज़हर से अब दूर तो रहना चाहते हैं पर अपने घरों में स्टॉक के तौर पर जो जमा कर रखा है उसका क्या करें? फिलहाल, इनकी इच्छाशक्ति इतनी प्रबल नहीं हुई है कि पेप्सी-कोक के कैन पर कैन नालियों में उडे़ल सकें। तो ऐसे सभी लोगों के लिए आज़ादी बचाओ आन्दोलन की सलाह है कि जिनके पास पेप्सी या कोकाकोला जैसे शीतल पेयों का स्टॉक है वे इन्हें फेंकने के बजाय संडास की सफ़ाई के काम में ले लें। है न ज़ोरदार सलाह ! आन्दोलन का कहना है कि आखिर लोग अपने घरों में संडास की सफ़ाई के लिए हाइड्रोक्लोरिक एसिड का इस्तेमाल करते ही हैं। पेप्सी-कोक में भी फास्फोरिक एसिड और कार्बोलिक एसिड जैसी चीज़ें हैं। संडास की सफ़ाई वाले एसिड और पेप्सी-कोक का पी.एच. मान भी तीन के आस-पास लगभग एक जैसा ही है। इस पी.एच मान की चीज़ों को आँतों में पहुचाना निश्चित रूप से नुकसानदेह है। ऐसे में अगर आपने ग़लतीवश पेप्सी या कोकाकोला ख़्ारीद ही लिया है तो पैसे और सेहत के नुकसान से बचने के लिए इनसे संडास की सफ़ाई कर लेना ही बेहतर उपाय है।
आन्दोलन के कार्यकर्त्ता कोई हवा में ये बातें नहीं कर रहे हैं। उन्होंने बाक़ायदा प्रयोग करके देखा और पाया है कि पेप्सी और कोकाकोला जैसे शीतल पेयों से संडास की गन्दगी वैसे ही चमाचम साफ़ होती है जैसे कि दूसरे एसिड से। तो चलिए, आप भी अपने घर में पड़े पेप्सी-कोक की बोतल या कैन निकालिए और फटाफट अपने संडास की सफ़ाई में लग जाइए। आखिर पेप्सी-कोक असलियत में हैं तो इसी लायक़ न !
सौन्दर्य का नाश करता है नशा
नशा, या थोड़ा और व्यापक अर्थ में कहें तो ‘व्यसन’, मनुष्य के मन और शरीर दोनों को ही असुंदर बनाता है। नशेड़ी या व्यसनी व्यक्ति की मानसिक शक्तियाँ कमज़ोर पड़ जाती हैं, स्मरणशक्ति दुर्बल हो जाती है, संकल्प-क्षमता ढीली हो जाती है और विवेक कुंद हो जाता है। व्यसनी व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ परिवार व समाज की भी तबाही का कारण बनता है।
शराब, सिगरेट, बीड़ी, तंबाकू, गुटखा आदि व्यसन के जितने भी रूप हैं, सारे के सारे ही शरीर को जर्जर बनाते हैं और स्थिति ऐसी हो जाती है कि असाध्य क़िस्म के तमाम रोग बिन बुलाए मेहमान की तरह आ धमकते हैं। यह प्रमाणित हो चुका है कि नशा करने वालों का सौन्दर्य धीरे-धीरे नष्ट होने लगता है। वैज्ञानिक अनुसंधानों ने यह भी अच्छी तरह सिद्ध कर दिया है कि धूम्रपान करने वालों पर बुढ़ापा जल्दी झलकने लगता है। दरअसल धूम्रपान का धुआँ शरीर के अंदर जाकर कुछ ऐसी क्रियाओं को बढ़ावा देता है जिससे त्वचा ढीली और पतली होने लगती है। त्वचा में झुर्रियाँ भी पड़ने लगती हैं तथा कम उम्र में ही बुढ़ापे का शारीरिक झुकाव शुरू हो जाता है। लंदन के सेंट थामस नामक अस्पताल में 50 समान जोड़ों का अध्ययन करने पर मालूम हुआ कि धूम्रपान करने वालों की त्वचा धूम्रपान न करने वालों से 28 प्रतिशत पतली हो गई थी। यह एक सच्चाई है कि सिगरेट, सिगार आदि ज़्यादा पीने वालों के चेहरों पर इतना स्पष्ट परिवर्तन आ जाता है कि सामान्य लोग भी दूर से देखकर ही अक्सर उनकी पहचान कर लेते हैं।
रोज़मर्रा सिगरेट पीने वालों को फेफड़ों का कैंसर 90 प्रतिशत, अन्य प्रकार के कैंसर 80 प्रतिशत, ब्रोंकाइटिस 80 प्रतिशत, हृदय रोग 30 प्रतिशत और एम्फिसीमा 20 प्रतिशत तक होने की आशंका रहती है। इसके अलावा पायरिया, बहरापन, मोतियाबिंद, श्वासनलियों में सूजन, अल्सर, भाँति-भाँति के मुख व मसूढ़ों के रोग, हड्डी का कैंसर, मूत्राशय का कैंसर, आँतों का कैंसर, श्वासनली का कैंसर, शुक्राणुओं की कमी, नपुंसकता, मानसिक विकार आदि भी होने की संभावना बनी रहती है। सिगरेट आदि के धुएँ में मौजूद कार्बन-मोनो-ऑक्साइड ख़्ाून के ऑक्सीजन को अवशोषित करके मस्तिष्क में इसकी आपूर्ति बाधित कर देती है। इसका नतीजा यह होता है कि मनुष्य की सहनशक्ति व स्मरणशक्ति कम होने लगती है और नाना प्रकार के मानसिक विकार पैदा होने लगते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार धूम्रपान से आँखों के लेंस पर धुँधलापन छाने लगता है और मोतियाबिन्द की संभावना बढ़ जाती है। धूम्रपान के धुएं में मौजूद हाइड्रोजन साइनाइड व अन्य हानिकारक रसायन श्वासनलिका को मोटी कर देते हैं, जिससे दमे की आशंका बढ़ जाती है। धूम्रपान से पेट में एसिड अधिक बनने लगता है, जिससे अल्सर की संभावना भी प्रबल हो जाती है। इसके अलावा धूम्रपान रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ाकर मधुमेह को भी आमंत्रण देता है। धूम्रपान का हृदय पर घातक असर होता है। सिगरेट के धुएँ की कार्बन-मोनो-ऑक्साइड गैस रक्त में हीमोग्लोबिन कम कर देती है तथा रक्त वाहिनियों की भीतरी सतह पर वसा का जमाव ज़्यादा कर देती है। इसके साथ ही निकोटीन हृदय की गति को अनावश्यक रूप से बढ़ाता है तथा यह कैटा कोलामीन की मात्रा भी बढ़ाता है जिसकी वजह से रक्त में वसा की मात्रा बढ़ने लगती है। इन सब वजहों से हृदयाघात, पैरालिसिस आदि बीमारियाँ बड़ी आसानी से धर दबोचती हैं।
अनुसंधानों से यह बहुत पहले साबित हो चुका है कि सिगरेट के धुएं में पाया जाना वाला पायरिन फेफडे़ के कैंसर का कारण बनता है। इसका धुआँ फेफड़े की कार्यप्रणाली को भी अव्यवस्थित कर देता है तथा धुएं में मौजूद टार फेफड़ों में संक्रमण, फेफड़ों की कोशिकाओं में सूजन तथा श्वासावरोध उत्पन करता है। महिलाएं अगर धूम्रपान करती हैं तो अपने साथ-साथ अपनी आने वाली संतानों का भी भविष्य बिगाड़ती हैं। धूम्रपान से गर्भपात का भय तो रहता ही है ,गर्भस्थ शिशु के रोगग्रस्त पैदा होने या उसके मरने का भी डर रहता है। स्तन कैंसर या स्तन के अन्य रोग, गर्भाशय कैंसर, मासिक धर्म की गड़बड़ी, चेहरे का लावण्य ख़त्म होने जैसी तमाम परेशानियाँ धूम्रपान की वजह से महिलाओं को झेलनी पड़ सकती हैं। शोधों से यह भी प्रमाणित हुआ है कि धूम्रपान करने वाली महिलाओं की मृत्युदर पुरुषों की तुलना में ज़्यादा होती है। चूँकि माताओं के स्वास्थ्य पर उनकी आने वाली संतानों का भी स्वास्थ्य बहुत हद तक निर्भर होता है इसलिए महिलाओं को नशे से बचाना कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। धूूम्रपान इतना नुकसानदेह है फिर भी चिन्ताजनक बात यह है कि इसकी गिरफ़्त में लोग फँसते ही जा रहे हैं। इस समय दुनिया की लगभग 110 करोड़ की विशाल आबादी धूम्रपान की शिकार है। इसमें से 80 करोड़ लोग विकासशील देशों के हैं और 30 करोड़ लोग विकसित देशों के। एशिया में 55.8 प्रतिशत पुरुष , 3.71 प्रतिशत महिलाएं तथा 33 प्रतिशत बच्चे धूम्र्रपान करते हैं। रिक्शा चालक और मज़दूर क़िस्म के लोग तो 80 से 90 प्रतिशत तक धूम्रपान के शिकार हैं। स्थिति यह है कि ये सभी नशेड़ी मिलकर पूरे साल में लगभग 60000 करोड़ सिगरेट पी जाते हैं। भारत जैसे देशों के नशेबाज़ 55 करोड़ सिगरेट रोज़ अर्थात् लगभग 20000 करोड़ सिगरेट साल भर मेें पीते हैं। विकसित देशों में 41 प्रतिशत पुरुष तथा 21 प्रतिशत महिलाएं नियमित रूप से धूम्रपान करते हैं। विकासशील देशों में लगभग 50 प्रतिशत पुरुष और 8 प्रतिशत महिलाएं नियमित धूम्रपान के आदी हैं।
धूम्रपान तथा विभिन्न रूपों में तम्बाकू सेवन से पूरी दुनिया में हर साल लगभग 30 लाख लोग असमय मौत के मुँह में पहुँचते हैं। इसमें भी लगभग एक तिहाई संख्या तो सिर्फ विकासशील देशों के लोगों की ही होती है। भारत में कैंसर से 10 प्रतिशत, साँस की बीमारी से 70 प्रतिशत तथा दिल की बीमारी से 25 प्रतिशत मृत्यु का कारण धूम्रपान होता है। केन्द्रीय स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो के अनुसार हमारे यहाँ हर साल लगभग 2200 करोड़ रुपया तंबाकू जनित बीमारियों के इलाज पर ख़्ार्च हो जाता है। सांख्यिकी और नियोजन विभाग के एक अनुमान के अनुसार 1989-90 में तम्बाकू सेवन करने वालों द्वारा किया गया मासिक ख़्ार्च 5060 करोड़ रुपये था, जो 1991-92 में 7964 करोड़ रुपये तक जा पहुँचा। स्थिति यह है कि यदि प्रति सिगरेट एक पैसे भी दाम बढ़ा दिया जाय तो सिगरेट बनाने वाली कंपनी का सालाना मुनाफ़ा 200 करोड़ रुपये अतिरिक्त हो जाएगा। अंदेशा यह है कि नाना रूपों मेंं तम्बाकू सेवन के नतीजे के तौर पर सन् 2020 के बाद हर साल पूरी दुनिया में लगभग एक करोड़ लोग मरेंगे। सिगरेट को होंठों तक लाने से पहले अपने को विवेकवान मानने वाले लोगों को एक बार यह ज़रूर सोच लेना चाहिए कि आदमी का फेफड़ा सिगरेट का धुआँ भरने के लिए नहीं बनाया गया है।
इसी तरह नशे के और रूपों के ख़्ातरे भी भयावह हैं। तम्बाकू युक्त गुटखा व पान-मसाला की वजह से संपूर्ण भारत में, खासतौर से उत्तरी भारत में तो ‘ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस’ जैसी कष्टदायी बीमारी महामारी का ही रूप लेती जा रही है। इस बीमारी में धीरे-धीरे मुँह बंद होने लगता है। इसी तरह ‘ल्यूकोप्लेकिया’ का प्रकोप भी बढ़ रहा है। ये बीमारियाँ कैंसर की शुरूआती स्थिति भी साबित हो सकती हैं। गुटखा, पान-मसाला खाने वालों को याद रखना चाहिए कि इनमें मिलाए जाने वाले विभिन्न पदार्थ जैसे- सैक्रीन, रंग, मेन्थॉल, इत्र आदि स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं। इनमें डाली जाने वाली सुपारी भी कम नुकसानदेह नहीं है। सुपारी की टैनिन प्रोटीन के पाचन में बाधा पहुँचाती है। सुपारी के ज़्यादा सेवन से शरीर में विटामिन ‘ए’ की भी कमी हो जाती है। कत्था को प्राय: लोग हानिरहित समझते हैं, पर इसमें भी टैनिन की काफ़ी मात्रा होती है। जब से सिन्थेटिक कत्था तैयार होने लगा है तब से स्थिति को और भी खतरनाक ही समझिए।
शराब के नशे का तो ख़्ौर पूछिए मत। इसने स्वास्थ्य और सामाजिक मूल्यों, दोनों का जितना नुकसान किया है वह आसानी से वर्णन नहीं किया जा सकता। शराब के चलते उजड़े घरों के दास्तान आये दिन सुनने-पढ़ने को मिलते ही रहते हैं। अब तो सड़क दुर्घटनाओं का एक सबसे बड़ा कारण भी शराबखोरी ही बन चुका है। शराब कितनी खतरनाक है इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि सामान्य हालत में जो व्यक्ति मार-काट की बात सोच भी नहीं सकता वह शराब के नशे में आसानी से हत्या करने पर आमादा हो सकता है। शराब मस्तिष्क को इतने हद तक अनियंत्रित कर सकती है कि आदमी पागल हो जाए। वास्तव में शराब की वजह से पागलों की संख्या में ख़ासा इजाफ़ा हुआ है। पागलों के दवाख़्ाानों के सर्वेक्षण से यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि हर दस पागलों में से छ: शराब की वजह से पागल हुए थे।
शराब पाचनतंत्र में गड़बड़ी तो पैदा ही करती है, यह स्नायुओं से लेकर यकृत और हृदय तक पर बहुत बुरा असर डालती है। नुक़सानों का परीक्षण करने के लिए इसे भोजन में मिलाकर सियार, कुत्ता, कबूतर, उल्लू आदि पशु-पक्षियों को दिया गया तो वे अकाल ही मृत्यु के शिकार हो गए। मदिरा का मद पेड़-पौधों तक पर अपना खतरनाक असर छोड़ता है। परीक्षणों में यह पाया गया है कि अगर मदिरायुक्त पानी पौधों की जड़ों में डाला जाए तो उनमें फल नहीं लगेंगे और वे धीरे-धीरे सूख जाएंगे। शराब मनुष्य की ज़िन्दगी को भी कुछ इसी तरह नष्ट करती है।
शरीर के बाह्य सौन्दर्य पर भी शराब का प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है। शराबी व्यक्ति की आँखों में धीरे-धीरे रक्त धँस आता है और वे रक्तिम दिखाई देने लगती हैं। अच्छी भली सुंदर आँखें भी शराब पीने से डरावनी लगने लगती हैं और उनका तेज समाप्त हो जाता है। ज़्यादा शराब चेहरे को भी जल्दी ही बूढ़ों की कतार में खड़ा कर देती है। यह बात अलग है कि सम्पन्न शराबी खान-पान में पोषकता का विशेष ध्यान रखकर शराब के दुष्प्रभावों पर परदा डालने की कोशिश करते रहते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो जाता कि वे इसके दुष्परिणामों से भी पूरी तरह सुरक्षित हो जाते हैं।
धूम्रपान की तरह मदिराप्रेमियों को भी अन्ननली का कैंसर तथा यकृत व मुँह के रोग हो सकते हैं। मद्यपान से शरीर में विटामिन ‘बी’ की भी कमी हो सकती है। इसके अलावा शराब छोटी आँतों के थायमिन व फोलिक अम्ल का अवशोषण करने वाले स्थान को भी क्षतिग्रस्त कर देती है। इसका फल यह होता है कि शरीर की अंदरूनी कार्यप्रणाली अव्यवस्थित और जर्जर होने लगती है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि शराब का नशा शरीर में तो गड़बड़ी पैदा ही करता है, यह मन में भी गड़बड़ी फैलाता है। अगर, मन में गड़बड़ी आ जाए तो विचारों में गड़बड़ी आना लाज़िमी ही है और आखिरकार शराबी की वाणी का भी लड़खड़ाना अनिवार्य हो ही जाता है।
अभी तक जिस तरह के व्यसनों की चर्चा की गई है उनसे प्राय: पूरा समाज परिचित है, परंतु अब नशे के इतने सारे नए-नए रूप पैदा हो गए हैं कि उनकी खोज-ख़्ाबर रख पाना भी एक टेढ़ा काम है। इस संदर्भ में नशीली दवाइयों की चर्चा कर देना विशेष ज़रूरी है क्योंकि नशे के इस तरीक़े ने घर-परिवार और समाज के सीमित दायरों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर भी गम्भीर समस्याएं पैदा कर दी हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था ‘इंटरनेशनल नारकोटिक ड्रग कण्ट्रोल बोर्ड’ ने चेतावनी दी है कि नशीली दवाइयों की खपत जिस गति से पूरी दुनिया में बढ़ रही है, उसके चलते कई देशों की सुरक्षा के लिए ही खतरा पैदा हो गया है। मौजूदा हालात ये हैं कि अमरीका, इंग्लैण्ड, जापान, चीन, हिंदुस्तान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि अमीर-ग़रीब सभी देश ही नशे के व्यापारियों के जाल में फँसते जा रहे हैं।
एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ अमरीका जैसे देश में ही ग्यारह करोड़ से अधिक लोग नशीली दवाइयों के शिकार बन चुके हैं। अमरीका की संस्था ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ड्रग एव्यूस’ की रिपोर्ट के मुताबिक 30 से 40 प्रतिशत अमरीकी बच्चे नशीली दवाइयों का इस्तेमाल करने लगे हैं। वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ नशीली दवाइयों के सेवन में भी बढ़ोत्तरी हो रही है, यह चिंताजनक और भयावह तस्वीर है। इसके अलावा अमरीका में क़रीब 50 लाख लोग कोकीन, 2 करोड़ लोग मार्जुआना तथा 50 लाख लोग हिरोइन का भी नशा करते हैं। अनुमान है कि हिन्दुस्तान में दस से पन्द्रह करोड़ लोग भाँग, गाँजा, चरस, हिरोइन , एल.एस.डी. तथा विभिन्न नशीली दवाइयों की आदत के शिकार हैं। आलम यह है कि अब होटल, ढाबे, स्कूल, कॉलेज से लेकर झुग्गी झोपड़ियों तक में नशीली दवाइयों के अड्डे बनते जा रहे हैं। महानगरों की स्थिति इस मामले में ज़्यादा भयावह है। देश की युवा-पीढ़ी बुरी तरह दिग्भ्रमित हो रही है।
नशीली दवाइयों में अफ़ीम, मार्फिन, पैथेडिन, हिरोइन, मैक्सिकन कैक्टस, भाँग,गाँजा, चरस, एल.एस.डी., मेथम फेहाइन, शाबएफिटेमिन, कोकीन, हिरोइन गु्रप की दवा बारविचुरेट्स, मनोदैहिक एवं नींद लाने वाली दवा कम्पोज, लारपोज, तिबरियम, वैलियम आदि का इस्तेमाल नशेबाज़ धड़ल्ले से करते हैं। ये सभी नशीली दवाइयाँ मूर्छा, बेहोशी, जड़ता तथा संवेदनहीनता पैदा करती हैं। इन दवाइयों की गिरफ़्त में फँसने की एक वजह यह भी है कि ये दर्द, पीड़ा एवं शूल से मुक्ति तथा जटिल समस्याओं एवं परिस्थितियों से जूझने का भ्रम पैदा करती हैं। जबकि अंतिम परिणाम यह होता है कि समस्याएँ और जटिल हो जाती हैं।
वास्तव में नशीली दवाइयों और तरह-तरह के व्यसनों का प्रचलन युवा पीढ़ी में जिस तेज़ी से बढ़ रहा है, उसके चलते स्वास्थ्य के साथ-साथ चरित्र, संस्कृति और राष्ट्रीय सुरक्षा तक पर ख़तरा मँडराने लगा है। नशेड़ियों की जमात न अपनी सुरक्षा कर सकती है, न राष्ट्रीय अस्मिता की। ज़रूरत अब व्यसन-मुक्ति के प्रति गंभीर होने की है। सरकारों से बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि उन्हें विभिन्न प्रकार के नशे के व्यवसाय से हज़ारों करोड़ रुपये सालाना राजस्व मिलता है। यही वजह है कि जनता को मूर्ख बनाने के लिए एक तरफ़ मद्य निषेध विभाग चलाया जाता है तो दूसरी ओर दारू की बिक्री बढ़ाने के लिए तरह-तरह के उपाय किए जाते हैं। नशाबंदी के लिए तो जनता में ही जागरूकता लानी होगी और व्यापक जनांदोलन छेड़ना होगा। इसके अलावा और कोई सरल उपाय नज़र नहीं आता।
नशे के शिकार जो लोग इससे मुक्ति चाहते हैं उनके लिए यहाँ कुछ सुझाव अवश्य दिए जा सकते हैं। गुटखा या पान-मसाला खाने वालों की आदत कुछ ऐसी हो जाती है कि वे अक्सर मुँह में कुछ रखकर चबाते रहना चाहते हैं। ऐसे लोगों को सौंफ़ चबाने की आदत डालनी चाहिए। सौंफ़ सुगंधित तो होती ही है, स्वास्थ्य के लिए भी अच्छी होती है। यदि मन को मज़बूत करके गुटखा या पान-मसाला के स्थान पर 2-3 हफ्ते तक भी सौंफ़ चबाएं तो गुटखे के व्यसन से आसानी से मुक्ति मिल सकती है। सौंफ़ के स्थान पर आँवले का भी प्रयोग किया जा सकता है। इसका तरीक़ा यह है कि ताजे़ हरे आँवलों को उबाल लें और गुठली निकालकर फेंक दें। अब उबले हुए आँवलों में पिसी हुई काली मिर्च, काला नमक और सेंधा नमक स्वाद के अनुसार डालकर ख़्ाूब मसलकर मिला लें और सुपारी के टुकड़े जैसे बनाकर धूप में सुखाकर सुरक्षित रख लें। गुटखा या पान-मसाला की जगह इन टुकड़ों को जब चाहें मुँह में रखकर चूसें, व्यसन धीरे-धीरे छूटने लगेगा।
सिगरेट पीने वालों के लिए वैज्ञानिक डॉ. एडवर्ड डोमिनों का सुझाव है कि यदि 50 ग्राम आलू, 85 ग्राम पके टमाटर का रस तथा 93 ग्राम पत्तागोभी का रस दिन में दो बार नियमपूर्वक सेवन किया जाय तो सिगरेट पीने की इच्छा नहीं होगी, क्योंकि इनमें ‘निकोटीन’ तत्त्व प्राकृतिक रूप में मौजूद रहता है। वास्तव में यदि आहार-विहार की शुद्धि के साथ योग, ध्यान आदि की विधियाँ नियमित रूप से अपनाई जाएँ तो नशे की जटिल परिस्थितियों पर भी आसानी से क़ाबू पाया जा सकता है। निष्कर्ष के रूप में यही कहा जा सकता है कि यदि आप अपना स्वास्थ्य और सौन्दर्य बचाए रखना चाहते हैं तो नशे से दूर रहिए। यह भी याद रखिए कि नशे से दूर रहकर आप अपना ही नहीं बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्र का भी भला करेंगे।
कुछ फुटकर नुस्खे
शहद :- शहद सिर्फ स्वाद में ही मीठा नहीं होता अपितु अपने अन्य गुणों में भी यह अतुलनीय है। इसमें अनेक महत्त्वपूर्ण विटामिन, खनिज, हार्मोन्स, अमीनो एसिड और एन्जाइम मौजूद रहते हैं। इसका एक प्राकृतिक गुण यह भी है कि इसके तत्व सीधे हमारे रक्त में पहुंच सकते हैं, इसलिए यह न केवल हमें तत्काल शक्ति प्रदान करता है, बल्कि अनेक बीमारियों से भी हमें बचाता है, साथ ही इससे हमारी पाचन शक्ति भी मजबूत होती है। चिकित्सा की दृष्टि से भी यह हमारे लिये बहुत उपयोगी है। हमारे मस्तिष्क और भावनाओं पर भी इसका चमत्कारी प्रभाव पड़ता है, जिससे मन को शांति मिलती है। तंत्रिका प्रणाली को विश्राम देकर तनाव को कम करता है। गुनगुने पानी में थोड़ा शहद डालकर पीने से अनिद्रा की बीमारी में लाभ होता है। इतना ही नहीं शहद शरीर की प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करता है, जिससे यह हमें अनेक बीमारियों से बचाता हैं
दही :- दही भी ऐसा एक प्राकृतिक भोज्य पदार्थ है, जो हमें बढ़ती उम्र में भी युवा और आकर्षक बनाए रखने में सहायक है। विटामिन ’ए’ और ’बी’, कैल्शियम, लौह, पोटेशियम, फास्फोरस आदि से युक्त दूध से बना होने से यह बिना कोई नुकसान पहुंचाए हमारे प्रोटीन की जरूरतों को भी पूरा करता है। इस तरह यह अधिक उम्र के ऐसे लोगों के लिए एक आदर्श भोजन है, जो मांस खाने से बचना चाहते हैं। दही एक प्राकृतिक एंटीबायोटिक भी है। यह पाचन प्रणाली में हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करता है और पाचन शक्ति को ठीक रखता है। बीमार लोगों के लिए भी दही बहुत उपयोगी है, क्योंकि यह अत्यंत सुपाच्य है और इससे शरीर बलवान होता है। दूध की अपेक्षा यह ज्यादा सुपाच्य है और इसमें भरपूर पोषक तत्व होते हैं।
स्वदेशी की स्थापना के लिये प्रतिबद्ध आंदोलन
हम सभी जानते हैं कि आज से 500 साल पहले 1498 में पुर्तगाली नाविक वास्को-डी-गामा ने भारत के लिये एक नये समुद्री मार्ग की खोज की और इसी समुद्री मार्ग से पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और बाद में अंग्रेज हमारे देश में आये और हमें गुलाम बनाया। वास्तव में वास्को-डी-गामा की खोज ने भारत की लूट का एक और मार्ग खोल दिया। उसके बाद अंग्रेजों ने भारत को न केवल लूटा बल्कि उसे अपना गुलाम भी बनाया। सन् 1600 में एक ईस्ट इंडिया कम्पनी और उसके साथ आयी अंग्रेजी फ़ौज ने समूची भारतीय व्यवस्थाओं तथा शिक्षाप्रणाली, आर्थिक व्यवस्था, व्यावसायिक प्रणाली, कृषि प्रणाली एवं सामाजिक व्यवस्था को तोड़कर 300-350 वर्षों तक हमें गुलाम बनाकर अपनी हुकूमत चलाई। उसके बाद गांधीजी के नेतृत्व में आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई और लगभग 20 करोड़ की से ज्यादा क्रान्तिकारियों की कुर्बानियाँ देकर हमने आजादी हासिल की।
आज फिर से हम गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं। पहले एक ईस्ट इण्डिया कम्पनी आई और उसने 300 साल तक गुलाम बनाये रखा परन्तु आज तो कई हजार बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हैं, तो कितने साल की गुलामी होगी? आपको शायद मालूम होगा कि 100-200 साल पहले अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाने और उस पर अपना शासन चलाने के लिये जो कानून और नीतियाँ बनाई थीं वे देश की आजादी के 50 साल बाद भी चल रही हैं। बस अन्तर इतना ही है कि पहले गोरे अंग्रेज शासन करते थे, परन्तु आज काले अंग्रेज शासन कर रहे हैं, बाक़ी सारी व्यवस्थायें और नीतियाँ ज्यों की त्यों हैं। इतना ही नहीं ,कार्यप्रणाली भी अंग्रेजी सभ्यता की ही है।
आज उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीति के नाम पर पूरे देश को ग़रीबी और बेरोज़गारी के दलदल में धकेला जा रहा है। हमारे देश की संस्कृति और परम्पराओं को न बढ़ाकर पश्चिमी आतताई और शैतानी संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। क्या यही सपना देखा था हमारे शहीदों ने ? क्या उन्होंने अपनी कुर्बानी इसी भारत के लिये दी थी
इन्हीं सब परिस्थितियों को देखकर आज़ादी बचाओ आंदोलन ने पूरे देश में सोये हुए युवाओं को जगाने का संकल्प लिया है। और साथ ही आज़ादी बचाओ आन्दोलन अपने समाज व सभ्यता के नवीनीकरण के लिये आवश्यक ज़मीन तैयार करने में लगा हुआ है। आंदोलन की कोशिश है कि हमारे मन में अपने देश, समाज, संस्कृति और सभ्यता के प्रति जो अनादर और निराशा का भाव आ गया है वह ख़त्म होकर आजादी और आशा का भाव जाग्रत हो तथा अपने प्रति आत्मविश्वास पैदा हो।
004 कितना समझते है आप बजट को ?? सिर्फ उतना जितना मीडिया ने बताया
https://rajiv-dixit-ji.blogspot.com/2025/05/004.html
.
Comments
Post a Comment